Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

शब्दों में बंधा मेरा दिल

सुरभि ताम्रकार, प्रसिद्ध लेखिका, दुर्ग

तुम्हें लिखते‑लिखते
मैंने तुम्हें सोचना टाल दिया था,
पर तुम्हारा लिखा पढ़ते ही
तुम खुद सामने आ गए।

शब्दों के बीच तुम्हारा व्यक्तित्व
गंभीर, स्थिर और साफ़ दिखाई दिया
पितृसत्ता की कोई परछाईं
तुम्हें छू तक न सकी कभी।

तुमने अपनी माँ की विरासत
सिर्फ़ संभाली नहीं,
पूरे सम्मान से जिया है
और वही संस्कार
तुम्हारी कलम में उतर आए हैं।

अब तुम्हारा सम्मान टालना
मेरे लिए मुमकिन नहीं रहा,
तुम्हारे केंद्र का स्त्रीवाद
धीरे‑धीरे मेरा भी संसार बन गया।

तुमने अपनी सोच की परिधि में
मुझे ऐसे बाँधा
कि बंधन भी आज़ादी सा लगा
और वहीं से प्रेम ने जन्म लिया।

तुम्हारे व्यक्तित्व से प्रेम हो जाना
कोई संयोग नहीं,
यह तो स्वाभाविक परिणति थी
तुम्हारे शब्दों की।

अब मुझे लगने लगा है
कि मैं तुम्हारी लेखनी की
प्रेयसी हो चुकी हूँ

तुम लिखते रहना हर रोज़,
मेरे दोस्त,
और मैं…
तुम्हें पढ़ती रहूँ
हर रोज़, हर बार, हर बार थोड़ा और।

2 thoughts on “शब्दों में बंधा मेरा दिल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *