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अँधेरे में जुगनू

सुरभि ताम्रकार, लेखिका, दुर्ग

मैंने कभी चाँद पाने की ख़्वाहिश नहीं की,
ना रोशनी पाने की।
अँधेरे को अपने मन के जुगनुओं से
रोशन करती रही।

पर प्रेम और समर्पण का क्या करूँ?
प्रेम इच्छा का दीपक बन बैठा है
तुमसे ही जगमग होता है।

शब्दों के दिए में
इंतज़ार का स्नेहक
मुझे छोटा करता जा रहा है।

ये प्रतीक्षा के पल
रात से भी लंबे हैं।
शायद इसीलिए अब
मन के जुगनुओं को
अँधेरा अच्छा लगने लगा है।

मैं चाहती हूँ
इस प्रेम की इच्छा को
उसी अँधेरे में खो दूँ
चाँद और रोशनी
ना पाने की चाह की तरह।

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