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अँधेरे में जुगनू

यह कविता प्रेम, प्रतीक्षा और आत्मसंवाद का सूक्ष्म आख्यान है। चाँद और बाहरी रोशनी को ठुकराकर कवयित्री अपने भीतर के जुगनुओं की रोशनी पर भरोसा करती है। लेकिन प्रेम की इच्छा जब प्रतीक्षा का दीपक बन जाती है, तो वही रोशनी धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है। यह रचना उस क्षण को पकड़ती है, जब मन अँधेरे से डरता नहीं, बल्कि उसे शांति और मुक्ति का स्थान मानने लगता है।

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