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मुझे ज़िंदगी में तिजारत करना नहीं आया

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज पुणे

ज़िंदगी में कुछ लोग तिजारत सीख जाते हैं और कुछ लोग इंसान रह जाते हैं. मैं शायद दूसरे किस्म का आदमी हूँ.
बाबूजी ने हमें कभी व्यापार करना नहीं सिखाया, उन्होंने हमें सुरक्षित रहना सिखाया. उनका पूरा जीवन सुरक्षा की पतली रस्सी पर संतुलन साधते बीता. खुद भी सुरक्षित, परिवार भी सुरक्षित आज, कल और उनके बाद भी.
रात को सोते समय घर में रखा सब्ज़ी काटने का चाकू वे हमेशा छिपा देते थे. डर चोर का नहीं था, डर इस बात का था कि कहीं वह चाकू किसी के हाथ लग गया तो अपनों को ही नुकसान न पहुँचा दे. उनकी आशंकाएँ हमें अजीब लगती थीं, पर आज समझ आता है वे डर नहीं, ज़िम्मेदारी ओढ़े रहते थे.
इसी ज़िम्मेदारी के बीच उन्होंने हमें तैरना सिखाने की भी कोशिश की. मुझे और मेरी बहन सुधा को. डालडा के पाँच लीटर वाले डिब्बे में हवा भरकर, उसे पीठ से बाँधकर, कसारी में बालोबा के कुएँ तक ले जाते थे. पर डर पानी का था. डर ऐसा कि न मैं तैरना सीख पाया, न सुधा.
बाबूजी चाहते थे कि पढ़ाई के साथ-साथ हम कोई हुनर भी सीखें. इसलिए बिजनेस की पहली पाठशाला बनी…गोगापुर का मेला.
मेले में बाबूजी के एक परिचितशायद शामगढ़ के राधास्वामी जनरल स्टोर्स से जुड़े हर साल खिलौनों की दुकान लगाते थे. उन्हें एक हेल्पर चाहिए था. बाबूजी ने बात की और मेरा दुकान पर बैठना तय हो गया. सुबह दस से शाम छह. मेहनताना तय नहीं था. बाबूजी का उद्देश्य था. बिजनेस समझाना. और मेरा लालच था. दिन भर मेले में रहना, खिलौनों के बीच. सेठ जी भले आदमी थे. दिन में दो-तीन बार चाय, कभी नाश्ता और मैं खुश. पहला दिन अच्छा गुज़रा. शाम को चार रुपए मिले. मुझे लगा, मैं भी कुछ कर सकता हूँ.
लेकिन दूसरे दिन ज़िंदगी ने मुझे मेरा पहला और आख़िरी व्यापारिक सबक दे दिया.
सेठ जी ने मेरी परीक्षा ली बिना बताए. एक डमी ग्राहक भेजा गया. हाथ में फटी हुई गेंद थी. कहने लगा- कल यहीं से ली थी.
मुझे याद नहीं था. मैंने मना कर दिया. वह झगड़ने लगा. गेंद नहीं, पैसे चाहता था. मामला बढ़ता देख मैं डर गया और मैंने गेंद के बदले पैसे दे दिए.
कुछ देर बाद सेठ जी आए. मैं चुप रहा. उस लड़के ने पैसे लौटा दिए. सेठ जी समझ गए यह लड़का दुकान के लायक नहीं है.
एक बिना बिके सामान के पैसे दे दिए. दूसरा ईमानदारी की बात खुद से नहीं कही. शाम को फिर चार रुपए मिले और अगला दिन आने से मना कर दिया गया.

उस दिन मैंने तय कर लिया मैं बिजनेस करने लायक नहीं हूँ. सेठ जी ने पूरा वाकया बाबूजी को बताया. बाबूजी ने डाँटा नहीं, बस इतना कहा- ऐसे तो सेठ का दिवाला ही निकलवा देता.
आज भी मुझे बिजनेस नहीं आता. लोग ज़िंदगी को भी व्यापार की तरह जीते हैं रिश्तों में भी नफा-नुकसान देखते हैं.पर मैं तो प्रेम से जीने वाला आदमी हूँ. इसमें बहुत कुछ खोया है मैंने, पर ठीक है जो हुआ, ठीक हुआ…
हम हैं राही प्यार के, हमसे कुछ ना बोलिए जो भी प्यास से मिला, हम उसी के हो लिए.

6 thoughts on “मुझे ज़िंदगी में तिजारत करना नहीं आया

  1. सही कहा मित्र आजकल लोग जीवन को , रिश्तों को व्यापार की तरह देखते हैं।पहले ऐसा भी था या हमारे संस्कार जो हमें मिले वो अलग थे।

  2. बिलकुल सही कहा आपने, मित्र।
    आज जीवन और रिश्तों में भावनाओं की जगह लेन–देन की सोच हावी होती जा रही है।
    पहले भी स्वार्थ था, पर उसे संस्कारों की मर्यादा बाँधे रहती थी।

    तब रिश्ते
    ज़रूरत से नहीं, ज़िम्मेदारी से निभाए जाते थे,
    लाभ से नहीं, लगाव से जिए जाते थे।

    आज इंसान बदल नहीं गया,
    बस प्राथमिकताएँ बदल गई हैं—
    जहाँ अपनापन बोझ लगने लगा
    और मतलब सबसे बड़ा सच बन गया।

    फिर भी सुकून इसी में है कि
    हम उन संस्कारों को थामे रखें
    जो हमें इंसान बनाते हैं,
    क्योंकि दुनिया चाहे जैसी हो जाए,
    संस्कार आज भी पहचान होते हैं। 🌱

  3. डालने के डब्बे में हवा कैसे भरते हैं पहले तो यह बता दीजिए आप ?

    1. आपने ग्रामीण जीवन जीया नहीं है, इसलिए आपको पता नहीं है. आपने स्वीमिंग पूल में रंग-बिरंगे ट्यूब से तैरना सीखा होगा यदि आता होगा तो, एक पहले ५ लीटर का एक डिब्बा आता था डालडा घी का उसका ढक्कन हम झलवा (एक तरह से वेल्डिंग) लेते थे. उसमें हवा रह जाती थी, जो किसी भी व्यक्ति को डूबने नहीं देती थी. यह एक तैरना सीखाने का ग्रामीण उपकरण होता था. जिसे कमर में बांध देते थे.

      1. करने लगे व्यापार हम हवा, पानी और रिश्तों का भी।
        बचा क्या, बचेगा क्या, क्या गलत, क्या सही ??

    2. बहुत बढ़िया पहले तो तिजारत का मतलब भी यही जाना ।
      दूसरा आप के बाबूजी का आप के परिवार के लिए सुरक्षा का भाव ।
      जिंदगी में कुछ न कुछ सीखना सीखना चलता रहता अहि तभी पता चलता है कि कौन सा हुनर कहा काम आता है।
      चे बिज़नेस करना नहीं आया हो पर आदमी को परखना तो आही गया होगा।

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