कमलसिंह का ठेलाः यादों की पीली दोपहरें

सुरेश परिहार, एडीटर, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

गांव की कच्ची गलियों से निकलकर पहली बार कस्बे के बड़े हायर सेकेंडरी स्कूल में कदम रखा था. मन में उत्साह था, पर भीतर कहीं एक अनजाना डर भीन कोई पहचान का चेहरा, न खेलने-कूदने का पुराना मैदान. गांव से आए वही कुछ दोस्त अब शहर में भी सहारा बने. पिताजी पास ही के गांव में शिक्षक थे. हर सुबह स्कूल भेजते समय दस पैसे का एक सिक्का मेरी हथेली पर रख देते दिनभर का खर्च यही है-कहकर. बस वही दस पैसे हमारा खाना भी थे, दोस्ती भी, और छोटे-छोटे सपनों का ईंधन भी. स्कूल के बाहर सब्ज़ी बाज़ार लगता था. उसी के किनारे कुछ ठेले कमलसिंह बापू का केले का ठेला, अहमद का बर्फ के लड्डुओं वाला, और पुलिया के पास पारस दा की चाय. इंटरवल होते ही टीचर पारस दा के यहां इकट्ठे हो जाते और हम बच्चे ठेलों की भीड़ में अपने-अपने हिस्से की खुशी ढूंढते.
कमलसिंह बापू हमें पांच पैसे में एक पका केला देते. अगर ज्यादा पका हुआ हो तो वही पांच पैसे में दो. हमारे लिए तो वही दावत थीदो केले मतलब पेट भरा, और दिल में एक छोटा-सा त्योहार. बाकी दोस्त अक्सर अहमद के शरबत और बर्फ के लड्डू पर टूट पड़ते. बापू ठेलेवाले जरूर थे, पर उनका दिल मंच पर जीता था. रामलीला में कभी विदूषक बन हँसाते, तो कभी रावण बन मंच का रौब बढ़ाते. शायद इसी रंगीन मिज़ाज ने उन्हें लड़कों में लोकप्रिय बना दिया.
उनके ठेले पर हमेशा कुछ नेतागिरी वाले छात्र जमा रहतेरमेश मीणा, मुख्त्यार, रमेश गुलाटी नाम अब धुँधले हैं, पर दृश्य आज भी आँखों में स़ाफ है. वहीं खड़े-खड़े क्लास रिप्रेजेंटेटिव से लेकर छात्रसंघ के अध्यक्ष तक की राजनीति पकती.
स्कूल से अथवा पढ़ाई से बापू का रिश्ता लगभग ना के बराबर था.

आठवीं से आगे शायद पढ़ ही न पाए. मगर बात उनकी ऐसी होती कि लोग रुककर सुनें. छात्र उन्हें मज़ाक में ही सही, पर दिल से “किंगमेकर” मानते. चुनाव की रणनीति बनती तो बापू ही निर्णायक वाक्य बोलते इने जिताड़ दो, आपणो आदमी है! और बस, सहमति की हवा बह जाती. मेरी उनसे पहचान कुछ और ही थी. पिता ने कभी उन्हें पढ़ाया था, यह जानकर वे मुझे अपनेपन से देखते. कई बार जब पिताजी छुट्टे देना भूल जाते, या जेब में केवल बड़ा नोट होता, बापू हँसते हुए कहते ले बेटा, आज उधार रहा, लेकिन सीमा तय पच्चीस पैसे से आगे नहीं. उधार बढ़ते ही गम्भीर होकर कहते ‘रेवा दे देवाएगा कोनी’ और हम हँसते हुए अगले दिन हिसाब चुकाने की कोशिश करते.. ..समय सरका, ठेले की वो दोपहरें पीछे छूट गईं. पर कमलसिंह बापू वहीं नहीं रुके. वही मिलनसारी, वही बोलने का हुनर उन्हें धीरे-धीरे राजनीति में ले आया. पार्टी में जिम्मेदारियाँ मिलीं, फिर एक दिन महिदपुर रोड के सरपंच की कुर्सी तक पहुँच गए.

राजनीति में भी बड़े पदों तक पहुंचे, अभी भी सक्रिय राजनीति और सार्वजनिक जीवन जी रहे हैं. मेरे दिल में उनकी तस्वीर अब भी उसी ठेले के पास खड़ी है. धूप में हल्की पसीने से चमकती हुई मुस्कान, और पाँच पैसे में दो केले की उदारता. वो दिन सरल थे. जेब में दस पैसे और दिल में संतोष. अब सोचता हूँक्या सच में हम गरीब थे? शायद नहीं हम तो बहुत अमीर थे. यादों में, अपनापन में, और उन छोटे-छोटे एहसानों में, जिन्हें शब्दों से नहीं, वक़्त से तौला जाता है.

6 thoughts on “कमलसिंह का ठेलाः यादों की पीली दोपहरें

  1. बहुत सही लिखा आपने, संतोष बड़ी चीज है।
    जो आज आमतौर पर नदारत है। पुरानी यादों का चित्र और उकेरने में आप माहिर है।

    1. बहुत अच्छा लिखा आपने , मेरी भी महिदपुर रोड की 1979 से 1988 तक की यादें स्मृति पटल पर उभर आई। जिस हाई स्कूल में मैंने प्राचार्यत्व भी संभाला । याद आता है वहां का भाईचारा, पंडित की कचोरी , बड़ी होटल की मावा बाकी, सांस्कृतिक कार्यक्रम में रुचि लेने वाले छात्र , शाला के सहयोग के लिए हमेशा तैयार रहने वाले जन व पंचायत। लेखन ,स्वगत व छात्र शाला जीवन का दर्पण है भाषा शैली में प्रवाह है । बधाई, शुभकामनाएं।
      अच्छी लेखन शैली पर बधाई

      1. धन्यवाद सर, आपसे ही सीखा है, आपने ही पत्रकारिता को बीज बो दिया था, कक्षा नवीं जब हस्तलिखित अखबार निकाला था. उसके बाद आपके लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ता रहा हूं. आपने मेरी लेखन शैली की सराहना की है, ये आपके आशीर्वाद का फल है. इस वेबसाइट पर बहुत अच्छे-अच्छे लेखक-लेखिकाएं हैं. आप उनकी रचनाओं पर भी अपनी प्रतिक्रियाएं देंगे तो हमारे लिए बड़ी गर्व की बात होगी.
        -आपका
        सुरेशपरिहार

  2. बहुत अच्छा लिखा आपने , मेरी भी महिदपुर रोड की 1979 से 1988 तक की यादें स्मृति पटल पर उभर आई। जिस हाई स्कूल में मैंने प्राचार्यत्व भी संभाला । याद आता है वहां का भाईचारा, पंडित की कचोरी , बड़ी होटल की मावा बाकी, सांस्कृतिक कार्यक्रम में रुचि लेने वाले छात्र , शाला के सहयोग के लिए हमेशा तैयार रहने वाले जन व पंचायत। लेखन ,स्वगत व छात्र शाला जीवन का दर्पण है भाषा शैली में प्रवाह है । बधाई, शुभकामनाएं।
    अच्छी लेखन शैली पर बधाई

    1. धन्यवाद सर, आपसे ही सीखा है, आपने ही पत्रकारिता को बीज बो दिया था, कक्षा नवीं जब हस्तलिखित अखबार निकाला था. उसके बाद आपके लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ता रहा हूं. आपने मेरी लेखन शैली की सराहना की है, ये आपके आशीर्वाद का फल है. इस वेबसाइट पर बहुत अच्छे-अच्छे लेखक-लेखिकाएं हैं. आप उनकी रचनाओं पर भी अपनी प्रतिक्रियाएं देंगे तो हमारे लिए बड़ी गर्व की बात होगी. -आपका
      सुरेशपरिहार

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