कमलसिंह का ठेलाः यादों की पीली दोपहरें

गांव से बड़े स्कूल में आना नया अनुभव था जेब में रोज़ के सिर्फ़ दस पैसे, और आधे इंटरवल में कमलसिंह बापू के ठेले से पाँच पैसे के दो केले ही हमारा भोजन। वही ठेला छात्रों की राजनीति का अड्डा था, जहाँ बापू कभी रावण, कभी विदूषक तो कभी किंगमेकर बनकर चमकते। उधार की सीमा पच्चीस पैसे तक थी, पर मुस्कुराकर केले थमा देने वाला उनका अपनापन आज भी स्मृति में ताज़ा है. छोटे दिनों की बड़ी गर्माहट जैसा।

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महिदपुर रोड: प्यार, सहयोग और परंपरा की धरती

महिदपुर रोड एक ऐसी जगह है जहाँ सेवा और अपनापन हर घर में बसा है। रात के अंधेरे में भी किसी की तबीयत बिगड़े तो सौभाग दादा का ट्रक हमेशा एंबुलेंस की तरह तैयार रहता था। यहाँ हर मुस्कान, हर रिश्ते में परंपरा और निस्वार्थ सेवा की गंध महसूस होती है।

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