खुशी खुशी कर दो विदा…

विनीता जैन, लेखिका, भीलवाड़ा (राजस्थान)

मन उदास है… दिल रो रहा है।
क्यों रो रही हो?
अपनी ही बेटी को, अपने ही घर से,
अपने ही तो घर भेज रही हो।
भूल गई क्या?
तुम भी तो आई थीं यहाँ, उसी तरह विदा होकर
तब से यही घर तुम्हारा है।
और जब यह समझती हो, जानती हो,
तो हँसकर विदा करो न अपनी बिटिया को…!

कहना आसान है, समझाना भी आसान।
पर कोई जाने कि दिल का बोझ कितना भारी होता है।
घर का एक छोटा-सा सामान भी कहीं रख दो,
तो बेचैनी तब तक बनी रहती है जब तक मिल न जाए।
फिर बेटी?
बेटी तो घर की धड़कन होती है
जिगर का टुकड़ा, आँगन की रौनक।

आज वही बिटिया दुल्हन बनकर विदा हो रही है,
तो कैसे शब्दों में बाँध दूँ इस पीड़ा को?
लगता है जैसे शरीर यहीं रह जाएगा
और जान उसके साथ चली जाएगी।

पर असली हिम्मत तो वहीं है,
जब आँसू पलकों तक आएँ, पर गिरने न दूँ।
बिटिया की मुस्कान देख कर
जुदाई का दर्द भी हल्का हो जाएगा।

और जब मेरी बेटी
दो कुलों की शान बढ़ाएगी,
तो गर्व से सिर ऊँचा कर कहूँगी

“मैं बेटी की माँ हूँ!”
यह बात बड़े गर्व से
सारे जहाँ को बतलाऊँगी…
हाँ, सारे जहाँ को बतलाऊँगी।

5 thoughts on “खुशी खुशी कर दो विदा…

  1. बहुत ही भावुक रचना। विनीता जी ऐसे ही लिखती रहे।

    1. विनीता जी बहुत सुंदर वर्णन है । यह एक बेटी की माँ के मन की व्यथा है।

  2. बिल्कुल सही कहा आपने। ‘मैं बेटी की मां हूं ‘ यह गर्व से कहना आसान नहीं है।

  3. बिल्कुल सही कहा आपने। ‘मै बेटी की मां हूं।’ यह कहना आसान नहीं है।

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