सोने की चूड़ियां

किश्वर अंजुम, लेखिका, भिलाई

सुमेरा ने अपनी सारी जमा-पूंजी अपने अब्बा के सामने रखते हुए कहा,
“अब्बू, भाई की फीस इन रुपयों से भर दीजिए।”

“पर बेटा, ये रुपए तो आपकी चूड़ियों के लिए जमा किए हैं न आपने!”

“ये भी आप ही के हैं अब्बू… चूड़ियों से ज़्यादा भाई की पढ़ाई ज़रूरी है,”
सुमेरा ने कहा और अपनी सारी बचत अब्बू को थमा दी।

सुमेरा को सोने की चूड़ियों का बड़ा शौक था। बचपन से ही बस यही उसका इकलौता ख़्वाब था। उसे पूरा करने के लिए वह सिलाई और ट्यूशन करके पैसे जोड़ रही थी। आज वही सारी बचत उसने भाई की मेडिकल कॉलेज की फीस के लिए बड़ी खुशी से निकाल दी।
निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार का बेटा मेडिकल की पढ़ाई करेगा. यह बात अपने-आप में बहुत बड़ी थी।

भाई मेडिकल की पढ़ाई में जुट गया और सुमेरा अपने ख़्वाब के लिए फिर से सरमाया जुटाने में…
वक़्त बीतता गया और सुमेरा पिया देस सिधारी। इस बार उसकी बचत उसके निकाह में काम आई। चूड़ियां अभी भी नहीं बन पाईं…पति के साथ गृहस्थी संवारने में जुटी सुमेरा अपना ख़्वाब नहीं भूली। फिर से बचत होती गई और चूड़ियों की कीमत तक पहुंच गई…
इस बार वह बचत ननद को ससुराल पहुंचाने में काम आई।
वक़्त बीतता गया… यूं ही बचत होती गई… और यूं ही ज़रूरतें पैदा होती गईं… और वह यूं ही भली बनकर अपनी चूड़ियों के लिए की गई बचत निकालती गई और रिश्तों का हक़ अदा करती गई।

परिवार तरक्की करता गया, लेकिन मां-बाप, सास-ससुर, भाई, बेटे, पति, नाती-पोते सबका खयाल रखने वाली सुमेरा की ख्वाहिश का किसी को खयाल नहीं रहा…!

“अम्मा की सांसे ख़ुदा जाने किस लिए अटकी हैं। बेटा, बहू, बेटी, दामाद, नाती, पोते सभी तो हैं। अब पता नहीं अम्मा को किसका इंतज़ार है! बेचारी, कितनी तकलीफ में हैं…!”

सुमेरा की आख़िरी घड़ी आ गई थी। हिचकी बंध गई थी, पर दम नहीं निकल रहा था।
दम कैसे निकलता?
वह तो वहीं अटका था. बचपन के उस अधूरे ख़्वाब में… चमकती, सुनहरी, सोने की चूड़ियों में!

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