
कविता सिंह, लेखिका, कानपुर
ये किताबें भी कितनी खुशनसीब होती हैं,
इन्हें हर कोई पढ़ना चाहता है,
इनकी गहराइयों में उतर जाना चाहता है।
और हम…
हम अपनी ज़िंदगी यूँ ही इन किताबों से बातें करते हुए बिता देते हैं।
पर न जाने, हमारी गहराई को समझने वाला
कब हमें यूँ गौर से पढ़ेगा…
कि हमारी इन ख़ामोश निगाहों की गहराई समझ पाए।
खामोशी खामोश होकर सब कुछ पढ़ रही होती