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“किताब”

किताबें सचमुच खुशनसीब होती हैं। हर कोई उन्हें खोलकर पढ़ना चाहता है, उनकी गहराइयों तक उतर जाना चाहता है। मगर हम… हम तो अपनी ज़िंदगी यूँ ही किताबों से बातें करते हुए गुज़ार देते हैं। पता नहीं, हमारी अपनी गहराइयों को समझने वाला कौन होगा…और कब आएगा…जो हमें भी किसी किताब की तरह ध्यान से पढ़ सके, और हमारी ख़ामोश निगाहों में छिपे अर्थों को समझ पाए।

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