Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

विषाद

हरीश श्रीवास्तव, वरिष्ठ साहित्यकार, मुंबई

भवानी आचार्या अपने केबिन में काम कर रही थी। पैंतीस वर्षीय वह कंपनी की एक ब्रांच की वाइस-प्रेसिडेंट है। जर्मनी से पढ़ी है और पता नहीं कितनी डिग्रियाँ हासिल की हैं। लोग उससे काम के मामले में डरते हैं, अन्यथा बहुत आदर और प्यार पाते हैं। उसके अंडर काम करने वाले बहुत कुछ सीखते हैं। कमी बस इतनी है कि उसका रंग साँवला है, पर नयन-नक्श एकदम जर्मन जैसे हैं।

थोड़ी देर बाद मोबाइल देखा तो महेश की कॉल थी.
“हैलो, कैसे फोन किया?”

महेश बोला -“रक्षा बंधन आ रहा है और बहनों ने बुलाया है, तो घर जा रहा हूँ। तुमने कहा था कि भारत का छोटा शहर नहीं देखा, तो चाहो तो चल सकती हो। दो-तीन दिन में वापस आ जाएंगे।”

“कब जाना होगा?”

“शुक्रवार सुबह फ्लाइट पकड़ लेंगे, फिर टैक्सी से पहुँच जाएंगे। इतवार रात वापस। तुम चार साल बाद घर जा रहे हो और वह भी इतने कम समय के लिए!”

“यदि चल रही हो तो खुद देख लोगी सब।”

“फिर तो जरूर चलूँगी। बहन को क्या दे रहे हो?”

“दो अंगूठियाँ खरीद ली हैं।”

“अरे यार! तुम्हारी सैलरी सात करोड़ साल की, अकेली जान और बस दो अंगूठियाँ!”

“बहुत किया है उनके लिए, पर अब मन नहीं होता। पता नहीं कैसे हामी भर दी कि आऊँगा। शायद तुम्हारी चाहत रंग ला रही है।”

“वाह साहब! ऑस्ट्रेलिया से चली आ रही मोहब्बत अभी भी है। तुम अमेरिका क्या गए कि सब भूल गए!”

“नहीं भवानी, कुछ भी नहीं भूला। भावनाओं में इतना बह गया कि और किसी ओर देखा ही नहीं. यहाँ तक कि अपनी ओर भी। लेकिन हमारी बातें तो होती रहीं!”

“उम्र गुजरती जा रही है महेश। अब फैसला लेने का समय आ गया है।”

“हाँ, ठीक कहा तुमने। घर से लौटकर निर्णय लेंगे। शुक्रवार सुबह पिक-अप कर लूंगा। बाय।”


महेश एक अमेरिकी कंपनी में ऊँचे पद पर है। उसका अपना फ्लैट है। पाँच साल पहले माँ की बीमारी के समय अमेरिका से आया था। माँ की हालत देखकर उसके मन में पिता और घर वालों के प्रति घृणा भर गई थी। उसके भेजे पैसों से बहनों के विवाह तो कर दिए गए, पर माँ का इलाज नहीं कराया। वह कराहती रही, घर के वातावरण और क्षुद्र विचारों में जूझती रही। एक दिन महेश की बाहों में दम तोड़ दिया।

क्रिया-कर्म महेश ने अच्छे से किया। जब जाने लगा तो पिता और चाचा आ गए.

“कुछ कर जाओ।”

“क्या कर जाऊँ?”

“कुछ धन दे जाओ। माँ की बीमारी में बहुत खर्च हुआ।”

“शर्म आनी चाहिए आपको। जिस माँ ने जीवन भर सेवा की, उसे वैद्य की दवाइयों पर छोड़ दिया। मुझसे पैसे वसूलते रहे और माँ को मार दिया। मैं जा रहा हूँ, और कभी नहीं आऊँगा।”
वह चला आया।

पर इस बार बहनों ने क्यों इतना आग्रह किया? और उसने कैसे मान लिया? शायद ईश्वर को कुछ मालूम हो।


शुक्रवार दोपहर बाद दोनों घर पहुँचे। टैक्सी रुकी तो घर वाले कौतूहल से देखने लगे। छोटे-बड़े सब महेश के पैर छूने लगे और भवानी को देखकर चकित रह गए।

पापा वहीं चाचा के साथ बैठे थे। तभी पापा की आवाज आई.
“ये छोकरी कौन है और यहाँ क्यों आई है? तुम आते से मिले भी नहीं!”

महेश बोला.
“इसकी क्या ज़रूरत?”

“इतने सालों में तुम्हारा ज़हर बुझा नहीं! और बुझना भी नहीं।”

“तो आए क्यों?”

“बहनों ने बुलाया है।”

फिर पापा भवानी की ओर मुड़े-“तुम्हारा नाम?”

“भवानी।”

पापा ठहाका मारकर बोले-“ठीक है! जैसा रंग वैसा नाम।”

भवानी मुस्कुरा दी-“सही कहा आपने। जैसी सोच वैसा इंसान।”

कमरा एकदम शांत हो गया।बहनों ने भवानी को कमरे में ले जाकर बैठा लिया। रात भर वे महेश की तारीफें सुनाती रहीं—कैसे पढ़ाया, कैसे खड़ा किया। दोनों शिक्षिका थीं और अपने पैरों पर।
“दीदी, आप भाभी हैं हमारी?”

“नहीं… हम बहुत गहरे दोस्त हैं।”

“आपकी शादी नहीं हुई?”

“हमने की नहीं।”

“भैया ने भी नहीं की। तो… रिश्ता?”

“बहुत पवित्र है अब तक।”

दोनों बहनें उसकी गोद में समा गईं।


अगले दिन राखी बंधी। महेश ने अंगूठियाँ दीं। भवानी बोली-
“दीदी, मुझे टीका नहीं लगाओगी?”

दोनों ने तिलक किया, तो भवानी ने पाँच-सौ की गड्डी थाली में रखकर आशीर्वाद दिया। पिता को देने लगीं तो पापा कुछ कहना चाहते थे, लेकिन भवानी बोली—
“उजाला रंग तभी है क्योंकि आसपास अँधेरा है। बोलने से पहले सोचिएगा।”

शाम को चारों ने शहर घूम लिया। रात को गिफ्ट बाँटते समय परिवार को अपनी सोच छोटी लगने लगी।

कमरे में बहनों ने कहा—
“दीदी, इतने पैसों का क्या करेंगे?”

“पढ़ाई। तरक्की। जरूरत हो तो मुझे कॉल करना।”


सुबह बरामदे में पिता और चाचा बात कर रहे थे-
“महेश हमें महत्व नहीं देता। कैसे लाइन पर लाएँ?”

तभी टैक्सी रुकी। महेश और भवानी बैग लेकर बाहर आ गए। माथे पर दोनों के तिलक लगे थे।

“हम वापस जा रहे हैं। जिस काम के लिए आए थे वह पूरा हो गया। ये दोनों बहनें हमें बुलाती हैं। और हाँ… यह जो लड़की है. इसका नाम भवानी आचार्या है… और मैं अगले हफ्ते इससे शादी करने जा रहा हूँ।”

वे आगे बढ़ ही रहे थे कि आवाज आई.
“भइया, रुकिए!”

दोनों बहनें भागती हुई आईं, एक के हाथ में दीया था। दोनों ने आरती उतारी-“अब भाभी के पैर छूने दीजिए।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *