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मैं ही ज्योति, मैं ही अनंत

bhagwa- hindu -india

डॉ. रोहन कांठेड़ (एमबीबीएस,एमडी), महिदपुर रोड (उज्जैन)

धरती और अंबर के छोर को ढूँढो,
धरा की किसी सुरंग के अंत को ढूँढो।
मेरे रक्त में तुम भगवा को ढूँढो,
रातों में आकाश के तारे ढूँढो।

तुम सूरज के घर को ढूँढो,
समुद्र की गहराई को ढूँढो।
अपने पुरखों के अंश को ढूँढो,
अपने अस्तित्व के मूल को ढूँढो।

हिमालय की चोटियों पर शौर्य को ढूँढो,
मरुस्थल की रेत में धैर्य को ढूँढो।
वृक्ष की जड़ों में जीवन को ढूँढो,
गंगा की धार में आशीर्वाद को ढूँढो।

वायु की गति में मेरा स्वर ढूँढो,
अग्नि की लपट में मेरा बल ढूँढो।
चाँद की शीतलता में मेरा मन ढूँढो,
सूर्य की किरणों में मेरा तन ढूँढो।

आकाशगंगाओं के पार मुझे ढूँढो,
समय के पार उस आरंभ को ढूँढो।
जहाँ शब्द भी मौन हो जाएँ,
उस शून्य में मेरी गूँज को ढूँढो।

नहीं मिलेगा कोई छोर तुम्हें,
नहीं मिलेगा कोई अंत तुम्हें —
क्योंकि सब मुझमें है, और मैं सबमें हूँ।
मैं ही ज्योति हूँ, मैं ही प्राण हूँ।
मैं भगवा हूँ, मैं अनंत हूँ।

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