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ओ पारिजात

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रीता मिश्रा तिवारी, प्रसिद्ध लेखिका, भागलपुर

रात गहराने लगी है…
और…
मनभावन सुगंध समीर महकने लगी है..!
चुपके-चुपके कलम
गुफ़्तगू करने लगी है…

ओ पारिजात…
जागकर और कितनी कविताएँ लिखूँ?
तेरी खुशबू से शब्द अब बहकने लगे हैं..!
जाने कितने स्वप्नों की सिंदूरी आभा लिए
गीली माटी पर अब बिछने लगे हैं…!

नहीं चाहिए मुझे सुंदर, मुलायम रंग
मुझे तो बस प्रेम का लाल रंग चाहिए।
महकाता रहे जो मेरी रूह को सुगंधों की तरह…
और मैं तुम्हारे आँगन के सुगंधित सरोवर की
पवित्र धारा में प्रवाहित हो ठहर जाऊँ…!

ओ पारिजात…
तुम आना मुट्ठी भर मिट्टी लेकर…
अपने क़रीब—उसी मिट्टी में बो देना तुम।
महकता रहूँगा तुम्हारे आँगन में साथ-साथ…!

कल्पनाओं की भूमि पर मेरे कलम से
खुशबुओं का बोझ अब उतरने लगा है…!

भोर की सिंदूरी बेला में तुम्हारे स्पर्श से
अब जी उठी है मेरी कविता…!

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