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ओ पारिजात

रात गहरी हो रही है और हवा में पारिजात की सुगंध घुल रही है। मैं जागता हूँ और कविताएँ लिखता हूँ, पर शब्द अब इस खुशबू में मदहोश होने लगे हैं। मैं रंगों की सुंदरता नहीं चाहता .मुझे तो प्रेम का वही लाल रंग चाहिए जो आत्मा को महका दे। मैं चाहता हूँ कि मैं पारिजात के आँगन की उसी मिट्टी में बो दिया जाऊँ, और वहीं लगातार महकता रहूँ। इस सिंदूरी भोर में, एक स्पर्श भर से मेरी कविता फिर जीवित हो उठी है।

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