आइना पूछता है…

मंजू शर्मा मनस्विनी, प्रसिद्ध लेखिका, भुवनेश्वर

आइना पूछता है अब मुझसे,
कौन हूँ मैं, किसकी तस्वीर?
चेहरा मेरा, पर परछाईं में,
बसती कोई और ही तासीर।

पलकों पर ठहरे कुछ मौसम,
होठों पर आधी मुस्कान,
वह भी तो उसने छोड़ी थी,
जाने किस ग़म की पहचान।

हर दिन सवेरा आता है,
पर उजियारा अधूरा-सा,
राहें वही हैं, कदम वही,
बस मन अब नहीं पूरा-सा।

यादों का एक घर है भीतर,
जहाँ खामोशियाँ बोलती हैं,
आइना देखूँ तो लगता है,
वह मुझमें अब भी डोलती हैं।

शायद इसी लिए टूट गया,
आइना एक दिन डर कर,
कैसे दिखाए वो सूरत…
जो जी रही है
किसी और के असर पर।

2 thoughts on “आइना पूछता है…

  1. बहुत सुंदर
    एक न एक दिन आइना टूट ही जाता है और हमारे सारे भ्रम मुट्ठी की रेत की तरह मिट्टी में मिल ही जाते हैं।

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