
डॉ.नेत्रा रावणकर, प्रसिद्ध लेखिका
क्या होता है आखिर
सब कुछ पाना?
सब कुछ होता ही नहीं है कभी…
बस थोड़ा सा बचना होता है
हर बार कुछ पाने के लिए…
पूरा भर जाना, फिर रीता होना
और भरने के लिए…
जैसे काले बादल की ओंट में
बचा जरा सा पानी…
दव मिश्रित भोर के अंक में
सहमी-सी रात की कहानी…
जैसे प्रिय से मिलने के बाद
शेष रह जाना उसका इंतजार…
काटे गए दरख़्त में भी
फूटती नई हरित कोपलें
सुनसान जंगल में
पंछियों के घोंसले
मंदिर की मूर्ति को
निहारने का ध्यास
पुनः पुनः मिलने की
मंगलमय आस…
कुछ भी पूरा नहीं होता कभी,
बच जाता है कुछ-कुछ
यूं ही आस-पास।
Bahut sundar vyakhya
सुन्दर रचना