
‘अर्चना मिश्रा ‘अश्क ‘ प्रसिद्ध कवयित्री
चुपचाप सा खामोश है
ये नीला आसमां।
मन पर गहरे दाग लिए,
नील पड़े संताप सा ही।
मेघाच्छादित हो आसमां सा ही,
हो जाता है ये मन नीलवर्णी।
आँखों के कोरों पर ढलका हुआ आँसू,
नीले आसमां सा ही।
बरस पड़ते बिन मौसम भी,
मन और आसमां दोनों।
धुल जाते हैं सारे संताप,
और हो जाता है स्वच्छ धवल ये मन,
नीले आसमां सा ही।