मैं कैसे हार मान लूं…

डॉ. अपराजिता शर्मा, प्रसिद्ध साहित्यकार, रायपुर (छत्तीसगढ़)

ज़िंदगी हर रोज़ नए इम्तिहान देती है। मुश्किलें आती हैं, रास्ते बंद होते नज़र आते हैं, और कई बार थकान हमें हार मानने के लिए मजबूर करती है। लेकिन मेरे भीतर की आवाज़ कहती है “मैं कैसे हार मान लूं?” हार मानना तो उस सपने को छोड़ देना है जिसे मैंने जीने के लिए चुना था। हार मानना तो उन उम्मीदों को बुझा देना है, जिन पर मेरे अपने भरोसा करते हैं।

संघर्ष ही हमें मजबूत बनाता है। गिरकर उठना ही जीत की पहली सीढ़ी है। यदि आज कदम थम जाएं तो कल की मंज़िल कैसे मिलेगी? ठोकरें हमें रास्ता दिखाती हैं, असफलताएँ हमें सिखाती हैं, और निराशा भी हमें नए अवसर खोजने की प्रेरणा देती है।

मैं हार नहीं मान सकती, क्योंकि मेरी जीत सिर्फ मेरी नहीं है; वह मेरे परिवार, मेरे समाज, और मेरे सपनों की जीत है। जब तक साँस है, तब तक उम्मीद है। इसलिए चाहे समय कितना भी कठिन क्यों न हो, चाहे राह कितनी भी लंबी क्यों न लगे—मेरे दिल की आवाज़ वही है:
“मैं कैसे हार मान लूं?”

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