विरह की चुप्पी…

मंजू शर्मा मनस्विनी, प्रसिद्ध साहित्यकार, भुवनेश्वर

संपूर्ण सादगी की मूर्ति बनी
ऊँचे टीले पर बैठी है वो,
मासूमियत की कली है।

सपनों की उजड़ी तस्वीर समेटे,
नयनों में अनकही ग़ज़लें पली हैं।

सूखा-सा वृक्ष खड़ा कह रहा है
कहानी उसके
उजड़े मन के आँगन की।

डाली पर बैठी अकेली चिड़िया
गा रही विरह का जीवन-गान।

पवन के झोंके पूछ रहे प्रश्न—
“किसका नाम लिए यूँ खोई हो?”
वो मौन रही, बस आँसू बोले—
“जिसके बिना अधूरी हुई हो।”

उसका विरह है सूखा मौसम,
पर चिड़िया की तान कहती है—
हर पतझड़ की धूल के पीछे
आशा की हरियाली रहती है।

टीला, वृक्ष, चिड़िया और नारी—
चार प्रतीक हैं जीवन की कड़ी।

सादगी, संघर्ष, आशा और धैर्य—
यही तो जीवन की असली झड़ी।

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