घर छोटे हुए, लेकिन संस्थाएँ बड़ी क्यों?

निधि श्रीवास्तव, प्रसिद्ध लेखिका, लखनऊ

आज के परिवेश में जहाँ संयुक्त परिवार पूरी तरह से विलुप्त होते जा रहे हैं, वहीं परिवार नामक संस्था भी चरमरा रही है। वजह जो भी हो, पर यह एक गंभीर विषय है जिस पर विचार करना अति आवश्यक है।

जहाँ पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे, वहीं धीरे-धीरे वे एकल परिवारों में बदल गए। इसकी एक वजह यह भी रही कि नौकरी के लिए दूसरे शहर में जाना पड़ा। कुछ जगह परिवार बड़ा होने पर अलग रहना मजबूरी हो गया। यह तो सामान्य कारण हैं, पर उससे भी ज्यादा गंभीर विषय यह है कि लोग एक ही मकान में अपने-अपने चूल्हे अलग कर लेते हैं। कुछ तो ऐसे भी हैं, जो अपने माता-पिता की इकलौती संतान होने के बावजूद भी अलग हो जाते हैं।

ऐसे में वे अपने बच्चों के लिए कैसे आदर्श प्रस्तुत करेंगे? क्योंकि बच्चे कितने भी महंगे कॉलेज से उच्च शिक्षा क्यों न ले लें, संस्कार तो वे अपने परिवार से ही सीखते हैं।

वहीं दूसरी ओर सामाजिक संस्थाएँ तेजी से बढ़ रही हैं और खासकर इसमें महिलाएँ ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

अनगिनत बढ़ती संस्थाएँ जो महिलाओं द्वारा सफलतापूर्वक चलाई जा रही हैं, फिर क्या वजह है कि परिवार रूपी संस्था बिखर रही है, जबकि वहाँ भी महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है?

परिवार को बाँधकर रखना, बड़ों का सम्मान करना और बच्चों को अच्छे संस्कार देना महिलाओं के ही हाथों में है।

जब महिलाएँ इतना बड़ा संगठन चला सकती हैं, समाज कल्याण में पूरा योगदान दे रही हैं, तो परिवार क्यों टूट रहे हैं? क्या वे परिवार को उतना समय नहीं दे पा रही हैं, जितना समाज कल्याण के लिए अपनी संस्थाओं को दे रही हैं?

कितना सहमत हैं आप इस विचार से?

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