टूटता मानव…

मधु मधुलिका

बेवजह लड़ने को तैयार आदमी
हो गए कितने बेकार आदमी।
जीने की जद्दोजहद है बहुत,
फिर भी हर तरफ बीमार आदमी।

डूबा कोई नशे में शराब के,
कोई सिगरेट का तलबगार आदमी।
ज़िंदगी की मौज कहाँ खो गई,
बस मरने को अब तैयार आदमी।

खुशियों की राह भूल गया है,
दिल में बस दर्द पाल रहा है।
खुद को ही अब ठुकरा रहा,
हो गया कितना बेज़ार आदमी।

हम चाहें किसी और को दिल से,
वो चाहें किसी और को मिल के।
प्यार के इस फ़रेब की गलियों में,
हो गया कितना गुनहगार आदमी।

हर तरफ़ झूठ–धोखे का बोलबाला,
सचाई का नहीं कोई रखवाला।
कैसे संभलेगी ये ज़िंदगी अब,
हो गया कितना होशियार आदमी।

पल-पल संवेदनाएँ खो रहा,
हार कर संघर्षों से बस रो रहा।
टूटती सब भावनाएँ नित्य ही,
कांधे को मिले बस चार आदमी।

दिल का बोझ अब सहता नहीं,
खुद से ही अब वह लड़ता नहीं।
ज़िंदगी से हार मान चुका,
हो गया कितना बीमार आदमी।

अंधेरों में भटका है बहुत अब,
खुद की खोज में बेकरार आदमी।
दिल का दर्द गर सुनाए कोई,
उसे कर देता अख़बार आदमी।

उम्मीदों का दीपक जले मन में,
सच के रास्ते पर क़दम बढ़ा ले।
सपनों को छूने की चाहत जगी,
तब हो सकता है साकार आदमी।

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