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टूटता मानव…

मनुष्य आज अपने ही भीतर टूट रहा है। बिना वजह झगड़े पर आमादा है, जबकि जीने की जद्दोजहद पहले से ही कठिन है। कोई शराब और सिगरेट जैसे नशों में डूबा है, कोई जीवन की खुशियाँ खोकर केवल मरने की प्रतीक्षा कर रहा है।

वह अपने दिल में सिर्फ़ दर्द सँजोए बैठा है और खुद को ही ठुकराता जा रहा है। प्यार के रिश्तों में भी उसे छलावा और धोखा मिलता है, जिससे वह गुनहगार-सा महसूस करता है। समाज में झूठ और धोखे का बोलबाला है, सच्चाई का कोई रखवाला नहीं। ऐसे में आदमी सिर्फ़ होशियार होना सीख गया है, संवेदनाएँ खो बैठा है और संघर्षों में हारकर रोने पर मजबूर है।

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