जाग रे इंसान

हारे समझा के गुरू, जाग ना सो इंसान
तेईस घंटे काम कर, इक घंटा प्रभू ध्यान धर ले।

द्वारे नौ इस जिस्म में, करवाएँ कम काज,
शब्द धुनात्मक द्वार दशम, मिलवाएँ भगवान। 

शब्द से धरती थमी और शब्दे थमा आकाश,
सृष्टि जननी शब्द होये, शब्द देवे प्रकाश।

रिहा न होवे जेल से, तन मन का ना साथ,
फँसा रहे काल चक्र में, तज जाएगा त्याग। 

नशा करो तो नाम का, वश में होगा काल,
अनहद वीणा, शंख धुनें, सुनकर हो बेहाल। 

घट अंदर धुनें पाँच हैं, घट की कीमत जान,
जाए पिंजरा छोड़कर, दो पल का मेहमान। 

मायावी लाख दान कर, सोचो ना ऊँची शान,
बिन फैलाए हाथ लें, नाम शब्द का दान। 

मन-बुद्धि बदले सभी की, बड़े छोट न भाव,
सबको प्यारा तू लगे, तू बाँटेगा प्यार। 

मित्र बना अपना ये मन, दुश्मन तेरा न कोई,
घोर मित्रता हो जाए, सुरती सोझी होइ। 

सुरत को लगाकर तू अपनी, जग में कर पहचान,
आत्मा-परमात्मा से ही, मिलन को भर उड़ान। 

डॉ. सरिता सदाबहार, प्रसिद्ध कवयित्री, लखनऊ

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