तीन शब्द


समाचार पत्र के आठवें पृष्ठ के एक छोटे से समाचार ने उसे हिला दिया “ गाँव बिकाऊ है “| उसने इन तीन शब्दों को कई – कई बार पढ़ा | सोचने लगा , आवश्यकता और सुख के साथ – साथ पशु – पक्षी और मनुष्य तो बिक ही रहे थे अब गाँव भी ..`..
अजीब सा लगा उसे | घबराहट सी हुई |
उसने अपने बैग को उठा कर गले में डाला और बाइक निकाल जा पहुंचा उस गाँव जहां बड़े – बड़े समाचार – पत्रों , चैनल्स की गाड़ियां साथ ही सरकारी तंत्र और व्यवसाइयों की भी गाड़ियाँ खड़ी थीं | कैमरे चमक रहे थे | दाम लग रहे थे …
पता है किसके ……
धूल उड़ाती , दरारों पटी बंजर जमीन के … अपनी ही गहराई नापते कुओं के … घर मकानों के… कोई नहीं पूछ रहा था पशुओं को ? न ही वहाँ के लोगों को ? अजीब दृश्य ! आँख भर आई उसकी | सोचने लगा मुर्दा गाँव का यह कैसा जश्न है ? कुछ वर्ष पहले ही तो मैं यहाँ एक बड़े कवि सम्मेलन को कवर करने आया था | कितना हरा – भरा लहलहाता गाँव था | मशीनों से ढलता मोटे धार का पानी , बिन ऋतुओं की फसलें | बिन बात कहकहे …
आज वीराना पड़ा है | शीशे सी जमीन पर औरतें खाली बर्तन सी लुढ़की पड़ी हैं | उनकी हंसी , उनके गीत बेताल से गाँव के ठूँठे पेड़ों पर खड़खड़ा रहे हैं | पुरुषों की शक्ति का पानी भी जैसे धरती सा सूख चुका है …बच्चे ही हैं जो इधर-उधर डोलते – भागते खेल रहे हैं | हंस रहे हैं | लड़ रहे हैं और कभी – कभी इकट्ठे होकर भीड़ और कैमरा देख एक दूसरे को ठेलते हुए भाग जा रहे हैं |
सबको देखता – सोचता धीरे – धीरे वह उस ओर निकल आया जहां चबूतरे पर बैठा एक वृद्ध अपनी सिकुड़ी आँखों से सामने के मकान की लाल दीवार यूं देख रहा था जैसे या तो वह उसमें घुसता चला जा रहा है या दीवार उसकी सिकुड़ी आँख में |
“ आप…यहाँ …क्यूँ … बैठे हैं –“ वृद्ध के पास बैठते उसने धीरे से पूछा | वृद्ध ने अजनबी भाव से उसे कुछ पल देखा और अपना चेहरा घुमा लिया |
“ बा…बा …ये सब …कैसे
कोई उत्तर नहीं | उनकी अधखुली आँखें अब दीवार से हटकर कहीं और स्थिर थीं | उसने थोड़ा साहस कर वृद्ध का कंधा छुआ था | भरी आँखें उसकी ओर मुड़ीं “ सब खतम हो गया ….
“ कुछ नहीं बचा …
“ सब … एक साथ … कैसे खतम बाबा …
……..
“ लोभ …
“ एक दिन लोभ ऐसा जीता कि धरती हार गई …और जब धरती ही हार गई तो —क्या बचेगा
लौट आया वह | सबके बीच से अपने को निकालकर | अपने सात वर्षों के करियर में आज न उसने कोई फोटो ली न ऑफिस जाकर रिपोर्ट करने का उसके भीतर कोई उत्साह था |

रेणुका अस्थाना, प्रसिद्ध लेखिका, भिवाड़ी (राजस्थान)

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