तुमने मित्रता का हाथ बढ़ाया,
मैंने सच्चे मन से उसे स्वीकार भी किया।
इससे एक अच्छी बात हुई,
कि मुझे एक नई सीख मिली—
हमेशा नए मित्र को परखकर ही अपनाना चाहिए।
तुम्हारी यह कोरी कल्पना थी कि
तुम्हारी मित्रता मुझे सदैव गुमान देगी।
परंतु मैं जान गई हूँ—
मित्रता में छिपा स्वार्थ और उसकी कठोर सत्यता।
मैं महसूस कर रही हूँ
तुम्हारी खट्टी-मीठी बातें,
तुम्हारी दिखावे की आवभगत,
तुम्हारी गरिमामयी उपस्थिति—
किसी बगुला-भगत से कम नहीं।
मेरी बेरंग जिंदगी में
रंग भरने की तुम्हारी झूठी कोशिश,
और अपने प्रेम-प्रसंग बताकर की गई ठिठोली
मेरी आस्था को जिंदा जला रही है।
मेरी तारीफ के पुल
मेरी आँखों के सामने झूल रहे हैं,
तुम्हारी झूठी शानो-शौकत
मेरी अस्मिता पर हमला कर रही है।
मेरे दोनों कंधे
मेरी उपलब्धि से तुम्हारे सपने ढो रहे हैं।
इतना ही नहीं,
तुम्हारी प्रसिद्धि का लालच
मेरी आहुति पर सवाल उठा रहा है।
और अब मैं समझ रही हूँ—
तुम्हारी मित्रता
कफन की तरह सफेद
और मौत की तरह ठंडी है।

डॉ. मीना मुक्ति, लातूर