सावन में छाई घटा घनघोर
रिमझिम बरसें बदरिया कारी
पीहर की याद सतावे न्यारी
पढ़े हैं झूले सावन के
घर आंगन अमुआ की डारी
बाबुल बिन ना सावन भावे
घर बाहर सब सूना लागे
नयनों में बदरा घिर आवें
पलकों बीच झिलकते अश्रु
छलकन को जब मचलावे
याद पीहर की बहुत आवे
उमड़-घुमड़ कर बिजुरी चमके
डर लागे मेघा बरस न जावे
कहीं बरसाती सावन धारा
इन आँखो से बह ना जावे
जब याद पीहर की आवे
कोई गावे कजरी,
तो कोई राग-मल्हार
मोर पपीहा और दातुर
कोयल मिलावें सुर ताल
ऐसी हूक उठे जिया में
याद पिया की आवे
चलो सखी री झूला झूलन
मिल-जुल पींग बढ़ावें
याद पीहर की आवे।

निरुपमा सिंह, कवयित्री, बिजनौर