मैंने अपने अब तक के जीवन में यात्राएँ बहुत की। नये स्थानों पर घूमना, वहाँ की प्रकृति,संस्कृति और स्थानीय जीवन शैली को निहारना बड़ा ही दिलचस्प लगता। सौभाग्य से बचपन से माता -पिता के साथ भारत के विभिन्न हिल स्टेशन, तीर्थ क्षेत्र, प्राकृतिक स्थलों के भ्रमण ने मुझमें नये स्थानों को करीब से जानने और अवलोकन करने में रूचि पैदा की। विवाह पश्चात् भी परिवार के साथ अनेक पर्यटक स्थलों पर विचरण का अवसर मिला।
उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक और उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, हरियाणा, दिल्ली आदि
राज्यों में कुछ प्रमुख शहरों की संस्कृति से परिचित होने का मौका मिला। टैक्सी, बस, रेल और हवाई यात्रायों के अपने – अपने रोचक अनुभव एकत्रित किए।
पर 11 जुलाई 2025 की यह यात्रा मेरे लिए सदा अनूठी और यादगार रहेगी। दोपहर करीबन 11:50 जब हवाईजहाज में अपनी सीट पर बैठी तो एयर कंपनी की
टैग लाइन ‘How time flies’ को पढ़ते ही ऐसा लगा जैसा आज के दिन के लिए मेरे ही लिए लिखा गया है।
हाँ, आज सच में लगा की समय पंख लगाकर उड़ गया।
अभी तो उस नन्हें हाथ के कोमल स्पर्श का एहसास मेरे हथेली से गया ही नहीं और पलक झपकते इतने वर्ष बीत गए कि अब उसी नन्हीँ परी से हाथों को छुड़ाते उसे एक परिपक्व छात्रा के तौर पर एक अंजान शहर में उच्च शिक्षा के सपने साकार करने हेतु तैयार करना। यह फ़ैसला करना मेरे लिए क्या शायद किसी भी पालक के लिए आसान नहीं होता, सैकड़ो उथल पुथल भरे भावों से पार आकर, अपनी क्षमता से आगे जाकर माता -पिता अपनी संतान की आँखों में पल रहे सपनों की ख़ातिर अपने आप को बदल देते। यहाँ भाव कुछ पाने का नहीं
बस अपने बच्चे की आकांक्षा में ख़ुद को ढालने का होता।
हालांकि चारों ओर अब यह सपनों का व्यापार फलफूल रहा,पर जब समय आता तब इसका एहसास होता। सो समझौते से परे हम निकल आए उस सफ़र पर
एक ऐसे अंजान शहर में जहाँ का मौसम, संस्कृति, खानपान, जीवन शैली सब कुछ हमारे प्रदेश से भिन्नता लिए हुआ था। पूरे सफ़र में मन में तरह -तरह के विचार आते -जाते रहे। बुलबुले की तरह उपजते असुरक्षा के भाव कोई मेरे चेहरे पर पढ़ ना ले इसका ख़्याल करते मैंने अपने भावों को नियंत्रित किया। क्यूंकि अब कुछ भी जाहिर करना मतलब बेटी के मनोबल को गिराना था। सो पूरी यात्रा में शांति से अपनी बेटी की बगल की सीट पर बैठी रही। शाम होते -होते जहाज के पहिए एक उमस भरे शहर की धरती पर आ थम गए। छोटे मन के साथ हमने देश के जाने माने मेट्रो नगर में कदम रखा। सबसे पहला काम ईश्वर का ध्यान करते हुए मुख से यहीं प्रार्थना निकली की हमेशा बेटी को अपने आशीर्वाद और कृपा कवच के आवरण में रखना। उसके सपने साकार हो बस यही कामना लिए हमने मंज़िल की ओर कदम बढ़ा दिए।

शैली भागवत, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर
