बेटी के संग अनदेखे शहर की दहलीज़ पर

“अभी तो उस नन्हें हाथ के कोमल स्पर्श का एहसास मेरे हथेली से गया ही नहीं और पलक झपकते इतने वर्ष बीत गए कि अब उसी नन्हीं परी से हाथ छुड़ाते उसे एक परिपक्व छात्रा के तौर पर एक अंजान शहर में उच्च शिक्षा के सपनों को साकार करने भेज रही थी। मन में असंख्य भाव उठ रहे थे, पर चेहरे पर दृढ़ता का आवरण ओढ़े मैंने सिर्फ बेटी के आत्मविश्वास को सँभालने की कोशिश की। शाम होते-होते जहाज के पहिए उस नए शहर की धरती पर रुक गए और दिल से निकली बस एक ही दुआ – ‘हे प्रभु! मेरी बेटी की राहें हमेशा सुगम और सफल बनाना।'”

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