पुणे शहर की रगों में सिर्फ इतिहास नहीं, आज की धड़कन भी बहती है और उस धड़कन की सबसे तेज़ लय सुनाई देती है फर्ग्युसन रोड पर। यहां की सड़कों पर चलती जवान होती नई पीढ़ी, अपने सपनों के स्केच बनाते कलाकार, नए फैशन की तलाश में भटकती युवतियां, और हर नुक्कड़ पर सजे खाने-पीने के ठिकाने .सब मिलकर एक ऐसा जीवंत कोलाज रचते हैं, जिसे देखना नहीं, जीना पड़ता है। चाहे वह ‘कट्टा’ पर बैठे युवाओं की हलचल हो, या ब्रश और कैनवास के बीच गहराते रंग, हर पल कुछ नया, कुछ असाधारण घट रहा होता है। यही पुणे है. जहां हर मोड़ पर ज़िंदगी मुस्कुरा रही होती है, और हर सड़क पर एक नई कहानी जन्म लेती है।कभी-कभी शहर के किसी एक रास्ते पर चलने भर से आप उस शहर की आत्मा से मिल लेते हैं। पुणे में फर्ग्युसन रोड (एफसी रोड) एक ऐसा ही रास्ता है .जो केवल एक सड़क नहीं, एक एहसास है।

सुबह की ताजगी, एक कप इरानी चाय और मक्खन के साथ बनपाव… एफसी रोड की सुबह कुछ ऐसी ही होती है। पहली बार पुणे आने पर किसी ने मुझसे कहा था – “अगर पुणे को समझना है, तो फर्ग्युसन रोड से शुरुआत करो।” और वाकई, यह सलाह नहीं, अनुभव की शुरुआत थी।
फर्ग्युसन कॉलेज – युवाओं का ऊर्जावान आँगन

सुबह की चाय के बाद मैं सीधे पहुंचा फर्ग्युसन कॉलेज 1885 में स्थापित, एक इतिहास को समेटे हुए परिसर। बरगद के पुराने पेड़, ब्रिटिशकालीन इमारतें, और लॉन पर बैठकर गिटार बजाते छात्र, शायरी सुनाते युवा – सब कुछ जैसे किसी फिल्म का दृश्य हो। यह स्थान शिक्षा का केंद्र होने के साथ-साथ युवाओं के सपनों और रचनात्मकता का संगम भी है।
दोपहर की चहल-पहल और ज़ायकों का उत्सव

दोपहर तक एफसी रोड अपने पूरे रंग में आ चुका था। सड़कों पर छात्रों की चहलकदमी, फुटपाथ पर बुक शॉप्स की भीड़, वडापाव की खुशबू और मसालेदार चाट की कतारें… सब कुछ आपको अपने साथ बहा ले जाता है। मैंने भी एक स्टॉल पर मसाला डोसा खाया और कुल्फी से दोपहर का स्वाद और मीठा कर लिया।
यह सड़क हर किसी के लिए कुछ न कुछ संजोकर रखती है – कोई पढ़ाई में डूबा है, कोई साक्षात्कार की तैयारी में, कोई पहली डेट पर आया है तो कोई पुराने दोस्तों के साथ हँसी बाँट रहा है। एफसी रोड एक जीती-जागती डायरी है, जिसमें हर दिन एक नई कहानी दर्ज होती है।
शामें भी यहां खास होती हैं

शाम को मैं क्रॉसवर्ड बुक स्टोर्स में जा घुसा। किताबों की खुशबू, धीमी बातचीत और पृष्ठ पलटने की आवाज़ – सबने कुछ पलों के लिए दुनिया की दौड़ थाम दी। हालांकि पहले जैसी विविधता और सजीवता अब उस बुक स्टोर में नहीं रही, फिर भी वहां बिताया वक्त सुकूनभरा था।
बाहर निकला तो हल्की फुहारें शुरू हो चुकी थीं। पीली लाइट में चमकती सड़कें और पत्ते, और दूर से आती कॉफी की खुशबू… उस पल दिल ने कहा – “अगर जिंदगी को बसाना हो, तो शायद यहीं…” लेकिन चाय पसंदीदा होने के कारण मैं पहुंच गया कनु की टपरी, जहां एक कप कड़क चाय ने उस शाम को यादगार बना दिया।
रात की सादगी और आत्म-संवाद
रात को एफसी रोड पर टहलते हुए युवाओं को घूमते, कपड़े खरीदते और हँसते देखना किसी जीवंत चित्र की तरह था। भूख तो लगी थी, लेकिन कुछ हल्का खाने का मन था। इसलिए ‘निरंजन’ में बैठकर इडली-वड़ा और गरमागरम सांभर का आनंद लिया।

सड़क के दोनों ओर टिमटिमाते लैंप पोस्ट के नीचे चलते हुए, अजनबियों की दुनिया निहारते हुए और भीतर कुछ सवालों के जवाब खोजते हुए… वह सड़क, वह शहर, और वह पल – सब मेरे भीतर कहीं दर्ज हो गए।
एफसी रोड मेरे लिए सिर्फ एक सड़क नहीं रही, वह पुणे के दिल की धड़कन बन गई – जहाँ शहर ने मुझे अपना दिल दिखाया और मैंने अपना मन थोड़ा हल्का किया।

- सुरेश परिहार, संपादक (लाइव वॉयर न्यूज नेटवर्क)