कश्मीर की तस्वीर

पिछले कुछ वर्षों से मन में एक अधूरी-सी इच्छा थी गर्मियों की छुट्टियों में परिवार के साथ किसी हिल-स्टेशन की सैर पर निकलने की. कभी स्कूल की परीक्षाएं, कभी ऑफिस के ज़रूरी प्रोजेक्ट्स, तो कभी देश की परिस्थितियॉं किसी न किसी कारणवश हमारा हर बार का प्लान धरा का धरा रह जाता. कश्मीर की योजना भी दो साल से ठंडी फाइल बनकर पड़ी थी. लेकिन इस बार कुछ अलग था शर्ली और जेमी दोनों घर पर थे, और हमने सोच लिया था अबकी बार कश्मीर पक्का!..
निर्णय की घड़ी
२१ मई की हमारी ट्रेन बुक थी, और २० मई की शाम तक माहौल में मायूसी थी. फिर एक साथ सबने तय किया जाएंगे तो कश्मीर ही! शर्ली के आंसू मुस्कान में बदल गए, जेमी और उसकी मम्मी नीता की आँखों में चमक लौट आई और २१ तारीख को हम जम्मू की ओर निकल पड़े एक सपने को साकार करने.जम्मू से श्रीनगर: टनलों की रोमांचक यात्रा
२२ मई की सुबह हम जम्मू स्टेशन पहुँचे, जहॉं हमारी टूर गाइड ईरहम जान की ओर से भेजे गए शौकत भाई हमारी अगवानी के लिए तैयार थे. अगली सुबह ५ बजे हम श्रीनगर की ओर निकल पड़े जम्मू से श्रीनगर लगभग २७० किलोमीटर का सफर, नेशनल हाईवे पर.जैसे ही जम्मू शहर से बाहर निकले, पहाड़ों की श्रृंखला शुरू हो गई छोटे, फिर बड़े, फिर उनसे भी ऊँचे पहाड़! कार अब घुमावदार रास्तों पर दौड़ रही थी. हमें लगातार टनलों का सामना हो रहा था एक के बाद एक, मानो प्रकृति और इंजीनियरिंग का एक अद्भुत संगम.
चेनानी-नाशरी सुरंग: तकनीक की मिसाल
इनमें से सबसे विशेष था चेनानी-नाशरी टनल, जो लगभग ९ किमी लंबी है और जम्मू-कश्मीर की सबसे बड़ी सुरंग है. टनल के भीतर शानदार रोशनी, ताजा हवा, अग्नि सुरक्षा, ड्रेनेज सिस्टम, वाई-फाई, मोबाइल नेटवर्क और इमरजेंसी एग्जिट जैसी सुविधाएं हमें एक नया अनुभव दे रही थीं.


टनल पार करते ही घाटियों का सौंदर्य और अधिक निखर उठा एक ओर हिमालय की ऊंचाइयों को चूमते वृक्ष, दूसरी ओर गहरी घाटियॉं, और उनके बीच बहती चंचल नदियॉं्. हमने देखा कि कई जगहों पर नदी के ऊपर ऊंचे पिलर्स पर नए रास्तों का निर्माण हो रहा है यह विकास है, लेकिन इसकी कीमत नैसर्गिक सौंदर्य से चुकानी पड़ती है.
मुश्किल रास्ता, पर मनमोहक दृश्य
इस पहाड़ी मार्ग की सुंदरता जितनी मनमोहक थी, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी. बरसात में यह रास्ता खतरनाक हो जाता है भू-स्खलन, जाम और दुर्घटनाओं की संभावनाएँ बनी रहती हैं्. रास्ते में हमें कई बार सेना के काफिलों के कारण रुकना पड़ा, लेकिन सुरक्षा और अनुशासन का वह भाव प्रेरणादायक था.लगभग २०० किमी की कठिन पहाड़ी यात्रा के बाद जब एकाएक समतल ज़मीन दिखी, तो जान में जान आई्. यह समतल भूमि श्रीनगर की ओर जाने का संकेत थी.श्रीनगर: घाटी में बसा स्वर्ग
श्रीनगर हिमालय की गोद में बसी एक समतल घाटी, चारों ओर बर्फ से ढके पहाड़, नीला आसमान और दूर तक फैली हरियाली. हमारी बुकिंग थी होटल अल-शिमाघ में, जहां मुस्तफा भाई ने गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया.यहीं से शुरू हुई हमारी असली कश्मीरी यात्रा डल झील की शांति, मुगल बागों की सुगंध, लाल चौक की हलचल और आगे सोनमर्ग, गुलमर्ग, पहलगाम की रोमांचकारी यात्राएं.
आगे का यात्रा वृतांत अगली कड़ी में ….

अनुपम नीता बर्डे
सुप्रसिद्ध साहित्यकार, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *