प्रयागराज: जहाँ जल भी मोक्ष का द्वार बनता है

जब धरती पर देवताओं के चरण पड़ते हैं, तो वह स्थान तीर्थ नहीं, तीर्थों का राजा बन जाता है. ऐसा ही एक पुण्यभूमि है प्रयागराज, जहाँ तीन पावन नदियाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती एक-दूसरे से आलिंगन करती हैं. इसे केवल संगम कहना, उसकी महिमा को सीमित करना होगा; यह आत्मा, श्रद्धा और सनातन संस्कृति का साक्षात मिलन बिंदु है.
गंगा यमुने चेव सरस्वत्यश्च सुप्रिये
त्रयोगमने पुण्यं प्रयागे फलमश्नुयात
(महाभारत)

प्रभात की पहली किरण जब संगम की जलराशि को स्पर्श करती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो सूर्य स्वयं स्नान करने उतरा हो. नावों की कतारें, मंत्रोच्चार की मधुर ध्वनि और भक्तों की श्रद्धा से भरी डुबकियाँये दृश्य केवल आँखों से नहीं, हृदय से अनुभव किए जाते हैं. त्रिवेणी में स्नान केवल जल से स्नान नहीं, आत्मा के अंधकार को धोने की प्रक्रिया है.

स्नानेन सर्वपापेभ्यः विमुक्तो भवति नरः.
संसारसागरात्‌‍? पारं याति संगमतः सदा.
(स्कंदपुराण)

संगम की ओर नाव से यात्रा करना किसी और ही लोक की यात्रा जैसी प्रतीत होती है. चप्पू की धीमी चाल, गंगा पर पड़ती सूर्य की किरणें, और नाविक के मुख से सुनाई देती संगम की पौराणिक कथाएँये सब मिलकर समय की सीमाओं को भंग कर देते हैं. नारियल, फूल और दीपक जब जल में तैरते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे श्रद्धा स्वयं लहरों पर सवार होकर प्रभु तक पहुँच रही हो.
हर ऋतु में संगम का रूप भले ही बदले, पर उसका भाव अटल रहता है संतुलन और सुकून.
माघ की ठंडी सुबह हो या सावन की भीगी साँझ, यहाँ की हवा में आत्मिक शांति समाई होती है. जैसे कोई अदृश्य शक्ति आपकी थकी आत्मा को धीरे-धीरे सहला रही हो.

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति.
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन्‌‍? सन्निधिं कुरु.
(स्नान मंत्र)

प्रयागराज केवल एक तीर्थ नहीं, यह हिंदू धर्म की जीवित आत्मा है. यह वहीं भूमि है जहाँ ब्रह्मा ने प्रथम यज्ञ किया, जहाँ वेदों की ऋचाएं गूंजीं, और जहाँ कल्पवास आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की साधना का केंद्र है. जब कुंभ में यहाँ जनसागर उमड़ता है, तो वह दृश्य केवल मानव समूह का नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति के अमरत्व का भव्य उत्सव होता है.
यत्र यत्र स्थितो धर्मः तत्र तत्र स्थिता शुभा.
सदा संगमतः पुण्यं लभते मानवो बुधः..

संगम में स्नान करना एक अनुभव है. धार्मिक, भावनात्मक और आत्मिक. वहाँ जात-पात, ऊँच-नीच कुछ नहीं रहता. केवल एक जीव, उसका ईश्वर और उनके बीच की यह पवित्र जलधारा. वही क्षण होता है जब मन हर द्वंद्व, मोह और माया से मुक्त होकर केवल स्व के समीप आता है.

सौ. सीमा सचिन जोशी
अध्यक्ष: विश्व ब्राह्मण समाज संघ, पुणे जिला
उपाध्यक्ष: पारीक समाज महिला मंडल, पुणे



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