प्रसिद्ध लेखिका सुषमा गुप्ता की लंबी कहानी मिस्टिक स्टे का पहला भाग

सुषमा गुप्ता
लीजिए भाई साहब। आ गया ब्लू सिटी।”
“यह ब्लू सिटी है! वो जो किले की छत से दिखाई देते हैं नीले-नीले घर, वो कहाँ गए!”
“अरे मैडम, वही जगह है। यह जो सामने गली है, वहाँ से मुड़कर सारे मकान आपको नीले ही मिलेंगे।”
उसने खैनी चबाते हुए ऐसे कहा, जैसे कोई शायरी सुना रहा हो।
समर्थ ने ऑटो वाले को पैसे दिए, फिर हया की तरफ हाथ बढ़ाकर कहा,
“आओ चलें तुम्हारे सपनों के शहर, जहाँ तुम कब से आना चाहती थी।”
हया मुस्कुरा दी। वे गली से थोड़ा आगे बढ़े, तो देखा, वाकई दोनों तरफ़ के मकान नीले रंग के थे। कौतूहल से वे दोनों आगे बढ़ते चले गए।
कभी साथ में सेल्फी, तो कभी किसी खिड़की-दरवाज़े के आगे खड़े होकर एक-दूसरे की तस्वीरें उतारते। उन दोनों के लिए यह सब बेहद अनूठा था। ठीक दुपहरी के समय में भी वे गलियाँ कमाल की ठंडक लिए थीं।
उन गलियों में अंदर जाकर एक हवेली आई, जिसकी बड़ी-बड़ी सीढ़ियाँ थीं। उन पर बनी सुंदर कलाकारी के आकर्षण में बँधी हया बिना कुछ सोचे सीढ़ियाँ चढ़ती चली गई।
दसवीं सीढ़ी तक पहुँचकर हया रुक गई। वहाँ से उस हवेली का दरवाज़ा दिख रहा था, जो खुला था। पूरे रास्ते में यह पहला मकान था, या हवेली कहिए, जिसका दरवाज़ा खुला था।
हया ने समर्थ को आवाज़ दी।
“समर्थ, इधर आओ। फटाफट मेरी तस्वीर खींचो इस दरवाज़े के आगे। पहला दरवाज़ा है, जो खुला मिला है।”
उसने बेहद उत्साह से कहा।
हया की आवाज़ सुनकर समर्थ तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ने को हुआ, पर ठिठक गया। अंदर से एक लड़का बाहर निकला, जिसके हाथ में पुताई का ब्रश था और कपड़ों पर जगह-जगह रंग लगा था।
हया ने एकदम से सकपकाकर कहा,
“सॉरी, हम बिना आपकी इजाज़त के ऐसे ऊपर चढ़ आए। मैं बस आपके इस सुंदर-से घर के आगे एक तस्वीर लेना चाहती थी।”
“यह घर नहीं है। कभी बहुत पहले था। अब होटल है।”
उस लड़के ने सपाट लहजे में कहा।
हया ने हैरान होते हुए दरवाज़े के अंदर झाँककर कहा,
“यह होटल है! क्या हम इसे अंदर से देख सकते हैं?”
तब तक समर्थ हया के बगल में आकर खड़ा हो गया था। वह लड़का कुछ देर उन दोनों को देखता रहा, फिर बोला,
“क्यों नहीं! बिल्कुल देख सकते हैं। आइए ना। हमारे पास इस वक्त काफी कमरे भी खाली हैं, अगर आप लेना चाहें तो।”
उस लड़के का लहज़ा अब बदल चुका था। पहले की उदासीनता उत्साह में बदल गई थी।
समर्थ और हया उसके पीछे-पीछे हवेली के अंदर आ गए। दरवाज़े के अंदर कदम रखते ही उलटी तरफ़ एक बड़ा-सा पत्थर का हाथी था। उसकी आँखें इतनी चौड़ी थीं और उसका रूप इतना रौद्र था कि हया डर गई। उसने समर्थ का हाथ कसकर थाम लिया।
आगे रिसेप्शन था, जिस पर बहुत से कैक्टस रखे थे।
“फूलों के पौधों से सजे रिसेप्शन तो बहुत देखे हैं। पर ऐसे कैक्टस से लदे-फँदे तो पहली बार देख रही हूँ!”
“यहाँ रिसेप्शन पर कोई नहीं है क्या?”
समर्थ ने उस लड़के से पूछा।
“यहाँ पर सब कुछ मैं ही देखता हूँ।”
“इतनी बड़ी हवेली को तुम अकेले कैसे सँभालते हो?”
हया ने हैरानी से पूछा।
“अकेला नहीं हूँ। एक लड़का और भी है मेरे साथ। छत पर एक रेस्टोरेंट है हमारा। वहाँ जो खाना बनाता है, वह लड़का भी यहीं रहता है। रोज़ सफाई करने वाली बाईसा भी आती है। आप यहाँ रुकेंगे, तो कोई दिक्कत नहीं आएगी। आपको सब सुविधाएँ हम देंगे। चाहें तो हम आपको कमरे भी दिखा सकते हैं।”
हया एकदम से बोली,
“हाँ, दिखाओ न। वैसे यह हवेली काफी पुरानी लग रही है।”
“जी हाँ, 600 साल पुरानी है।”
“600 साल! आप लोगों ने बहुत सुंदर मेंटेन की हुई है।”
हवेली की ऊँची छत की तरफ देखते हुए हया ने कहा।
लेखिका के बारे में –
डॉ. सुषमा गुप्ता
डॉ. सुषमा गुप्ता साहित्य और कॉरपोरेट जगत के बीच एक सशक्त सेतु हैं। प्रबंधन, कानून और अकादमिक क्षेत्र की गहरी समझ के साथ उनका साहित्यिक व्यक्तित्व जीवन के विविध अनुभवों, मानवीय संवेदनाओं और समय की जटिलताओं को अभिव्यक्ति देता है। एम.कॉम., एमबीए, एलएलबी और पीएचडी जैसी शैक्षणिक योग्यताओं से समृद्ध डॉ. गुप्ता ने वर्ष 2007 से 2014 तक मानव संसाधन विषय की व्याख्याता के रूप में कार्य किया। वर्तमान में वे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में प्रबंध निदेशक के पद पर कार्यरत हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं में उनकी सक्रियता और सृजनात्मक विस्तार उल्लेखनीय है।
कविता, कहानी, लघुकथा और उपन्यास के माध्यम से उन्होंने मानवीय मन की संवेदनाओं, संबंधों की पेचीदगियों और समकालीन जीवन के बदलते स्वरूप को स्वर दिया है। उनकी प्रकाशित कृतियों में कविता संग्रह उम्मीद का एक टुकड़ा, कहानी संग्रह तुम्हारी पीठ पर लिखा मेरा नाम और मन विचित्र बुद्धि चरित्र, उपन्यास क़ितराह और तलब तथा लघुकथा संग्रह संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण शामिल हैं।
आकाशवाणी से लेकर पॉकेट एफएम तक, और साहित्य तक से लेकर आशुतोष राणा के चैनल पंचतंत्र वन तक, उनकी रचनात्मक यात्रा साहित्य के विविध माध्यमों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। पॉकेट एफएम के लिए सौ से अधिक कड़ियों की श्रृंखला लिखने के साथ-साथ वे हिंदी में अनूदित विदेशी उपन्यासों और हिंदी के कालजयी साहित्य पर केंद्रित विशेष श्रृंखलाओं के माध्यम से साहित्य की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही हैं।
उनकी रचनाएँ हंस, नया ज्ञानोदय, पाखी, कथादेश, कादंबिनी और हरिगंधा सहित अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। लघुकथा रत्न सम्मान, हरियाणा साहित्य अकादमी का प्रथम पुरस्कार, लिट-ओ-फेस्ट मुंबई का सर्वश्रेष्ठ पांडुलिपि अवार्ड और दैनिक जागरण वूमेन अचीवर्स अवार्ड सहित अनेक सम्मानों से अलंकृत डॉ. सुषमा गुप्ता का साहित्यिक अवदान निरंतर विस्तार पा रहा है। क़ितराह के लिए हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का वर्ष 2023 का श्रेष्ठ कृति सम्मान उनकी सृजनात्मक उपलब्धियों में एक उल्लेखनीय पड़ाव है।
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