
संतोषीदेवी
हम जो स्त्रियाँ लिखती हैं,
उनकी नज़र में
यह सत्ता के ख़िलाफ़ है,
क्योंकि
हमें सिखाया गया था
बेल-बूटे बनाना,
रंगोली सजाना,
ख़ुद को सजाना-सँवारना।
लेकिन हमने
चुपके से कलम उठाई
उस हाथ से,
जो
चूड़ियों की खनक तक सीमित था।
और उकेरते ही
आ गईं
बिगड़ैलों की कतार में।
पता है तुम्हें,
काग़ज़ पर
फूल नहीं उगाए थे हमने,
लिख दी थी
जड़ों की आग,
देह की थकान
और चुप्पियों का विद्रोह।

बहुत ही सार्थक कविता
बहुत सुन्दर कविता
👌🏻👌🏻
बहुत सुंदर स्त्रीत्व को समर्पित रचना। लाजवाब
बहुत सुन्दर कविता