
मनजीत शर्मा “मीरा“
“मैं अपनी बीवी से बहुत प्यार करता हूँ।” उदास-सी आवाज़ में कहकर माइकल ने सिर झुका लिया।
“इसमें परेशानी वाली क्या बात है? मैं समझ सकता हूँ कि तुम सच बोल रहे हो।”
“पर उसे मेरी बात पर यकीन नहीं आता।”
“यकीन नहीं आता… क्या मतलब? मेरे ख्याल में तुम एक अच्छे, सभ्य और शालीन युवक हो. तुम्हारी बीवी को तुम पर विश्वास करना चाहिए। मैंने अक्सर तुम्हें उसके लिए उपहार लाते देखा है, बाज़ार में शॉपिंग करते देखा है और पिछली बार तो तुमने उसके जन्मदिन पर एक बड़े होटल में शानदार पार्टी भी दी थी। तुम हमेशा उसके प्रति उदार रहे हो, मेरे दोस्त।”
“हाँ, मैं रोज़ी के प्रति हमेशा बहुत उदार रहा हूँ। जो वह कहती है, मानता हूँ। फिर भी वह सीधे मुँह मुझसे बात नहीं करती। उसे समझना बहुत मुश्किल है।”
“तुम ठीक कहते हो। इन औरतों को समझना वाकई बहुत मुश्किल होता है। कभी बिल्कुल अपनी-सी लगती हैं और कभी एकदम अजनबी बन जाती हैं। अब मेरी पत्नी को ही देखो… दो साल कितना बहकाया उसने मुझे। बार-बार रूठकर अपने फादर के घर चली जाती थी।”
कहकर सैम ने हाथ में पकड़ा गिलास मेज़ पर रख दिया और कुर्सी पर कुछ ज़्यादा ही पसर गया।
“मन छोटा मत करो, दोस्त! लो, पहले ये भुने हुए काजू खाओ। मेरे ख्याल में तुम्हारी वाइफ वाकई अच्छी है। कितना ख्याल रखती है तुम्हारा। जान देती है तुम पर… पर मेरी ने तो जीना हराम कर रखा है।”
“माइकल, मैं तुम्हें बहुत करीब से तो नहीं जानता। बस, पिछले दो साल की दोस्ती है हमारी। पहली बार हम क्रिसमस पर चर्च में मिले थे। और आज शायद छठी या सातवीं बार इस बीयर बार में मिल रहे हैं। पर मैं दावे से कह सकता हूँ कि तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो।” सैम ने प्लेट से कुछ चीज़ फिंगर्स उठाए और गिलास से वाइन का एक सिप लेते हुए माइकल के चेहरे पर नज़रें गड़ा दीं।
“दरअसल…!”
“दरअसल क्या? बताओ… दोस्त से कैसा पर्दा?”
“दरअसल वह उस दूसरी औरत को बर्दाश्त नहीं कर पा रही।”
सैम के हाथ से गिलास फिसलते-फिसलते बचा। उसने माइकल का कंधा थाम लिया।
“क्या कह रहे हो तुम…? दूसरी औरत…? और वह भी तुम्हारी ज़िंदगी में? मज़ाक तो नहीं कर रहे, यार? कहीं दिमाग तो नहीं फिर गया तुम्हारा? तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? तुमने तो अपनी वाइफ से लव मैरिज की थी।”
“की थी… ज़रूर की थी मैंने रोज़ी से लव मैरिज… पर मैं उसे भी बहुत प्यार करता हूँ।”
“मुझे बहुत हैरानी हो रही है। मैंने तुम्हें इस तरह का आदमी नहीं समझा था। मैं तो हमेशा यही समझता था कि तुम अपनी फैमिली से बेहद प्यार करते हो। एक सीधे-सादे और घरेलू आदमी हो तुम। मुझे अब भी यकीन नहीं आ रहा। लगता है तुम्हें कुछ ज़्यादा ही चढ़ गई है। अब अगला पैग बिल्कुल मत लेना। लाओ, अपना गिलास मुझे दो।”
“ठीक है, जैसा तुम सोचना चाहो, सोच सकते हो। किसी को समझने के लिए कुछ पल का साथ भी बहुत होता है। मैंने कहा था ना, मेरी बीवी मेरी बात पर अब विश्वास नहीं करती। तुम भी नहीं करोगे तो कोई तूफान नहीं आ जाएगा। लाओ, यह बोतल मुझे दे दो। बस, एक आखिरी पैग और लेना चाहता हूँ। बुरा मत मानना दोस्त, पूरी तरह रिलैक्स होना चाहता हूँ।”
“ठीक है! पर आज तुमने कुछ ज़्यादा ही चढ़ा ली।”
“आगे सुनो, दोस्त! तुम सुन रहे हो ना…?”
“हाँ, मैं सुन रहा हूँ… होश तो तुम खो रहे हो।”
“दरअसल उस दिन क्रिसमस पर मैं उससे मिलने चला गया था तो मेरी वाइफ रोज़ी ने घर के बर्तन पटक दिए। दस दिन बाद उसका फोन आया कि वह बीमार है। मैं डॉक्टर को लेकर उसके घर गया। मेरे गले से लगकर वह देर तक रोती रही। इस पर भी रोज़ी ने बवाल खड़ा कर दिया।”
“तुम्हारी वाइफ को यह सब बताता कौन है? क्या वह तुम्हारी चौकीदारी करती है?”
“हाँ, कई बार करती भी है। लेकिन मैं भी सारी बातें उसे सच-सच बता देता हूँ। कुछ नहीं छिपाता उससे।”
“बड़ी हिम्मत की बात है! एक बात सच-सच बताना। पहले अपना चेहरा ठीक करो। हाँ, ऐसे। अब मेरी आँखों में देखो। यूँ व्यंग्य से मत हँसो दोस्त, सच-सच बताओ। तुम्हें जीसस की कसम है! क्या वह बहुत सुंदर है?”
“हाँ, बहुत सुंदर!”
“तुम्हारी वाइफ से भी ज़्यादा?”
“हाँ, रोज़ी से भी ज़्यादा!”
“तुम्हें वह आखिरी पैग नहीं लेना चाहिए था। मुझे लगता है, नशे के कारण तुम बहक रहे हो। याद करो, पिछली बार तुमने मुझे बताया था कि तुम्हारी वाइफ दुनिया की सबसे सुंदर औरत है।”
“हाँ, कहा था… पर वह उससे ज़्यादा सुंदर नहीं है।”
“लगता है तुम उस औरत से कुछ ज़्यादा ही प्रभावित हो। तुम किसी दबाव में तो नहीं हो ना, दोस्त? क्या वह बहुत पैसे वाली है?”
“नहीं, वह गरीब है और मुझे ही अपनी दौलत समझती है।”
“क्या वह तुम्हारी ज़िंदगी में तुम्हारी शादी के बाद आई है?”
“नहीं…!”
“फिर तुम्हारा दिमाग वाकई फिर गया है। यदि तुम्हें उससे इतना ही प्रेम था तो तुम्हें रोज़ी से शादी नहीं करनी चाहिए थी।”
“हाँ, कल की घटना से मुझे ऐसा ही महसूस हो रहा है।”
“कल क्या गुल खिला आए तुम? लगता है तुम साइकी हो गए हो। अपनी बीवी को तंग करने में तुम्हें मज़ा आने लगा है।”
“मुझे कोई मज़ा नहीं आता। मैंने कहा ना, मैं अपनी बीवी से बहुत प्यार करता हूँ।”
“बहुत प्यार करता हूँ। झूठ बोलते हो तुम…।”
“नहीं, मैं सच कह रहा हूँ। बाई गॉड…।”
“फिर कल क्या हुआ था…?”
“कल मेरा जन्मदिन था…।”
“ओह! हैप्पी बर्थडे टू यू…!”
“थैंक यू…! हाँ, तो कल मेरा जन्मदिन था। और मैंने अपना बर्थडे उसी के घर पर, उसी के साथ मनाया।”
“व्हाट नॉनसेंस…? रबिश! बट व्हाय…?”
“क्योंकि रोज़ी नहीं चाहती थी कि मैं उसे पार्टी का निमंत्रण पत्र भेजूँ। उसे इनवाइट करूँ। रात को घर भी नहीं आया। वहीं रुका। इसीलिए तूफान मचा रखा है उसने।”
“बड़े अजीब आदमी हो तुम! दूसरी औरत का ख्याल रखते हो और अपनी बीवी का नहीं। रात को दूसरी औरत के घर पर रुकते हो और कहते हो कि मेरी बीवी ने तूफान मचा रखा है। तुम दो नावों में सवार हो, दोस्त। साफ शब्दों में कहूँ तो ढोंगी, मक्कार और धोखेबाज़ इंसान हो तुम। मुझे दुःख है कि मैंने तुम्हारे जैसे चालबाज़ इंसान के साथ दोस्ती रखी…।”
कहते हुए सैम उठ खड़ा हुआ और अपना कोट पहनने लगा।
“बैठो सैम, कम से कम इस वक्त मुझे छोड़कर ना जाओ। मुझे तुम्हारी बेहद ज़रूरत है। तुम तो मुझे समझने की कोशिश करो।”
“खाक समझूँ… अगर मेरी दोस्ती चाहते हो तो खुद को बदलो, माइकल। सुधारो खुद को। गलत तुम हो, तुम्हारी वाइफ नहीं।”
माइकल की आँखें भर आईं। रुँधे गले से बोला, “वह भी यही कहती है कि मैं गलत हूँ, लेकिन इससे मैं उस औरत को छोड़ तो नहीं सकता। आखिर उसने मुझे पाल-पोसकर इतना बड़ा किया है। माँ है वो मेरी…।”
