लोगों को हँसाना ही मिशन, महाकाल की सवारी ने दी देश-दुनिया में पहचान

कीर्ति राणा, इंदौर
अपने पहनावे, किसी भी कार्यक्रम के संचालन और बोली-ठिठोली के रूप में रंग जमाने के साथ ही सैकड़ों की भीड़ में भी अलग से पहचाने जाने वाले स्वामी मुस्कुराके अपनी खास वेशभूषा और इस नाम से इतने ख्यात हैं कि कई लोगों को उनका असली नाम (पंडित शैलेंद्र व्यास) जानना भी जरूरी नहीं लगता। वे उज्जैन के ऐसे अनोखे शख्स हैं, जो अपनी अनूठी राजसी वेशभूषा, रंग-बिरंगी टोपियों और लोगों को हँसाने के लिए जाने जाते हैं। वे पिछले लगभग 39 वर्षों से बाबा महाकाल की निकलने वाली सवारी का एक मुख्य और लोकप्रिय आकर्षण रहे हैं। सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल पद से सेवानिवृत्त और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शैलेंद्र व्यास ने सेवा में रहते पढ़ाने से ज्यादा ऐसे सेवाकार्य किए, जिनसे राष्ट्रपति पुरस्कार की राह आसान हो गई।
बचपन बड़नगर में बीता
आर्य समाजी पिता पं. राजेंद्र व्यास प्रिंसिपल रहे। सावन महीने में वहाँ निकलने वाली शिवजी की सवारी में मामा ओम प्रकाश भार्गव स्वाँग भरते थे, भांजे शैलेंद्र को भी तैयार करके सवारी में ले जाते थे। 39 साल पहले एक वक्त वह भी था, जब वे उधार का कुर्ता-धोती-टोपी लेकर बड़नगर की सवारी में जाते थे। परिवार उज्जैन आया, यहाँ साइंस कॉलेज में एडमिशन ले लिया। रैगिंग का भय था, तब 1982 में रैगिंग से बचने के लिए पहलवान मोहन यादव से सिफारिशी चिट्ठी लिखाने से राहत मिल गई। महाकाल की सवारी 1982-83 में पहली बार देखी, तो बड़नगर वाला बचपन याद आने के साथ ही लगा कि सवारी में आकर्षक रूप से शामिल होना चाहिए। सवारी में उधार की धोती-कुर्ता-डंडा लिया. लोगों को अच्छा भी लगा, तो कुछ ने खिल्ली भी उड़ाई। अगले साल की सवारी में सजने-सँवरने के लिए साल भर पैसे इकट्ठा किए, नई ड्रेस बनाई। अलग-अलग तरीके के तिलक लगाने के लिए काँच के सामने प्रैक्टिस की। काँच में उलटा लिखा, तो मस्तक पर सीधा दिखा।
वर्ल्ड में सारे स्वामी हैं, मुस्कुराए कोई नहीं
उन्होंने ‘स्वदेश’ से चर्चा में कहा, वर्ल्ड में विभिन्न नामों वाले संत हैं, लेकिन मुस्कुराके नाम वाला कोई नहीं, इसलिए यह नाम रख लिया। लोगों को रुलाना आसान है, लेकिन हँसाना मुश्किल, इसीलिए ये नाम बेहतर लगता है।सावन-भादो में निकलने वाली महाकाल की सवारी में मेरे साथ जो अन्य तीन आकर्षक वेशभूषा में शामिल होते हैं, उनका नामकरण भी मैंने किया है। मनोहर गुप्ता नायक का नामकरण स्वामी खिलखिलाके, दिनेश रावल से ड्रेस बनवाई, नाम रखा स्वामी दिल मिला के, मोहित गेहलोत स्वामी गुदगुदाके और चौथे हैं पप्पू तलवार। महाकाल की हर सवारी में हमारी तैयारी-मेकअप थीम बेस्ड रहता है। एक वक्त वो था, जब मैं उधार के कपड़े पहनकर तैयार होता था और अब मेरे घर के दो कमरे दर्जनों राजसी वेशभूषा, 150 से अधिक विभिन्न प्रकार की पगड़ी, सौ से अधिक अंगूठियाँ, सैकड़ों माला, बाजूबंद, तीर-बर्छे, भाले, गदा, ढाल-तलवार से भरे पड़े हैं। बाकी स्वामियों के लिए भी इंतजाम हो जाता है।
राष्ट्रपति, सीएम से लेकर संतों, अधिकारियों सबके साथ मुस्कुरा रहे
उनका घर ‘स्वामी पैलेस’, 41 शिवाजी पार्क, बाहर से ही नहीं, अंदर की सजावट से भी अनूठा है। इन दो कमरों में एक कमरे में राष्ट्रपति, पीएम, लोकसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों, बॉलीवुड कलाकार, प्रमुख संत, महामंडलेश्वर, आईएएस, आईपीएस के साथ चित्रों की भरमार है, तो दूसरा कमरा राजसी वेशभूषा का म्यूजियम बना रखा है। यही नहीं, 80 के दशक से अब तक जारी हुए प्रेस नोट, लोगों से मुलाकात वाले विजिटिंग कार्ड, ट्रॉफी, शील्ड, मेडल आदि अलमारियों में भरे पड़े हैं। अलमारियों-टेबल के दराज पर भी उपलब्धियों के सर्टिफिकेट चस्पा हैं।
स्वाँग बनाकर पहले-पहल सवारी में शामिल होना हिम्मत का काम मानता हूँ, क्योंकि तब कई लोगों ने मजाक भी उड़ाया, लेकिन इस सवारी ने धीरे-धीरे पहचान दिलाई। 92 के सिंहस्थ से हमें भी देश-विदेश में पहचान दिलाई। सवारी के दर्शन को उमड़ा हुजूम यह भी तलाशता है कि इस बार हमने क्या रूप धरा है। अपनी आकर्षक वेशभूषा के साथ शादी समारोह में चाट-चूरण का स्टॉल लगाने वाले व्यास बताते हैं, उन्हें कार्यक्रमों में लच्छेदार अंदाज में संचालन का गुण पिता राजेंद्र व्यास से विरासत में मिला। वे नाट्यकर्मी रहे, उनका सांस्कृतिक-वैदिक स्वरूप रहा है, नाटकों में सूत्रधार भी रहे, तो उन्होंने बोलने की कला सिखाई।पत्नी हेमा व्यास मावि ऋषिनगर में शिक्षिका हैं और पति द्वारा धरे जाने वाले विभिन्न रूपों से उन्हें भी कोई आपत्ति नहीं है। बल्कि खुशी होती है, जब लोगों से पति की तारीफ सुनती हैं।
जिस शहर में गए, वहाँ ड्रेस तलाशी
महाकाल की सवारी या अन्य मेलों में वे राजा-महाराजाओं की तरह भारी-भरकम, रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्र और भव्य पगड़ी पहनकर शामिल होते हैं। कमरे में संग्रहित विभिन्न तरह की ड्रेस के संबंध में उनका कहना था, बॉडी बिल्डिंग स्पर्धा के सिलसिले में मुंबई जाना रहता था।
वहाँ धार्मिक सीरियल और फिल्मों के लिए ड्रेस बनाने वाले तलाशे, राणा प्रताप, शिवाजी की पगड़ी का संकलन किया।राजस्थान गए, तो वहाँ राजसी वेशभूषा और ढाल-तलवार, हथियार वाले तलाशे। उदयपुर, चित्तौड़ से जूतियाँ ढूँढ़ीं। साउथ के राज्यों में गया, तो वहाँ की ट्रेडिशनल ड्रेस तलाशी।सवारी में पर्यावरण संरक्षण, बेटी बचाओ का संदेश, ब्रह्मोस मिसाइल, पंद्रह अगस्त के संदेश की थीम की भी सराहना हुई। ढाबा रोड पर अपने टेलर वाले सुनील भावसार को जैसा आइडिया दिया, वैसी ड्रेस तैयार कर देते हैं।
कई शहरों से धार्मिक शोभायात्रा आदि में शामिल होने के निमंत्रण आते हैं, लेकिन व्यावसायिक रूप नहीं दिया। बाबा महाकाल की गरिमा बनाए रखने का सवाल है, जो अपनी मेहनत, भक्ति से कर रहे हैं।
सम्मान से उज्जैन का मान बढ़ा
शासकीय कन्या मावि नलिया बाखल से रिटायर 62 वर्षीय व्यास को 2001 में राज्यपाल पुरस्कार और श्रेष्ठ शिक्षक राष्ट्रपति अवॉर्ड 2004 में मिला। मप्र सरकार ने 2025 में शरद जोशी व्यंग्य सम्मान दिया।इसके साथ ही चार इंटरनेशनल अवॉर्ड, बॉडी बिल्डिंग डिप्लोमा अवॉर्ड, बेस्ट ऑर्गनाइजर बॉडी बिल्डिंग अवॉर्ड सहित अनगिनत ट्रॉफियों-मैडल, सम्मान-पत्र से अलमारियाँ भरी पड़ी हैं।

इतना कुछ पता ही नहीं था! थैंक्स सर, बहुत उपयोगी लेख था
अपनी अपनी मस्ती देखो
मस्ती कितनी सस्ती देखो