
संध्या यादव, मुंबई
सोच रही थी,
क्या फर्क है तुममें और मुझमें…
तुम भी औरत, मैं भी औरत।
रंगीन पन्नियाँ उतार दो जो चेहरे की,
तो हमारा चेहरा वैसा ही तो है—
पहचान तलाशता, ठौर ढूँढ़ता,
वही सुरक्षा की तलाश, माथे पर
अपनत्व की हथेलियों की चाह…
तुम भीड़ से डरती,
मुझे भीड़ से वितृष्णा।
तुम गहरे मेकअप में सब कुछ छिपाती,
मैं काजल, बिंदी की आड़ में
खुद ही छिप जाती…
वही पाँच दिनों की पीड़ा,
वही मेनोपॉज की तकलीफ,
वही बच्चों की सुरक्षा, वही परिवार की मुस्कान,
अपनों में तलाशती अपनों को,
युग-युग से भटकती आत्माएँ।
क्या फर्क है तुममें और मुझमें…
है… है… है… बहुत फर्क है।
तुम डरती हो बिना रंग ओढ़े
खुद का सामना करने से।
मैं अपने अँधेरों को रूमाल-सा साड़ी में
कमर पर खोंस इतराती हूँ।
तुम आँसू भर आने पर चश्मा चढ़ा
सबसे छिपाती हो,
मैं पनीली आँखों से ठहाके लगा बतियाती हूँ…
तुम चेहरे की झुर्रियों, बालों की सफेदी से डर जाती हो,
मैं अपनी इसी खूबसूरती पर इतराती हूँ।
तुम जब लटके-झटके दिखा आँखों में
क्षणिक प्रेम जगाती हो,
मैं बच्चों के संग तोतली भाषा बोल
आजन्म का सुख पाती हूँ…
खरीदारी, गोलगप्पे, चूड़ियाँ, कपड़े ऑर्डर कर
तुम लोगों के खौफ से घर पर मँगाती हो,
या फिर विदेश की दुकानों के चक्कर लगाती हो।
मैं गली के मोड़ पर खड़ी
“भैया, थोड़ा और चटपटा” बोल,
चटखारे लगाती हूँ।
तुम्हें कोई छेड़े तो अखबार की सुर्खियाँ बन जाती हो,
मैं वहीं चार गाली सुना
मन की भड़ास निकाल आती हूँ…
हाँ, कि तुम सुविधा भोगी हो,
मैं सुख-दुख भोगी हूँ।
तुम रंग-बिरंगी, डिजाइनर “सॉफ्ट टॉय” हो,
मैं ठोंक-पीटकर गढ़ी लकड़ी की “गुड़िया” हूँ।
तुम्हारे मरने पर मरणोत्सव मनाया जाएगा,
मेरे मरने पर शायद कोई आँसू भी नहीं बहाएगा।
तुम तिरंगे में लिपट इतिहास में दर्ज हो जाओगी,
मैं जिंदगी की छाती पर पैर रखकर,
दो गज कफन में मौत के पीले पन्ने पर
अपने नाखूनों से खरोंचकर इतिहास लिख जाऊँगी…
मिलेंगे जब वहाँ अपना सफर तय कर,
शर्त है मेरी…
मैं तुम नहीं,
तुम मुझ-सी बनना चाहोगी।
