
शावर भकत, वृंदावन
बस इतना बता दो,
मेरे शब्दों में
जब-जब स्वयं को पढ़ते हो
और स्वयं से मिलते हो,
तब-तब कैसा अनुभव करते हो?
होंठों से न सही,
शब्दों की निःशब्दता में ही बता दो,
क्योंकि नीरवता में ही
मौन प्रेम की ऋचाएँ मुखरित होने लगती हैं।

जब शब्द मौन हो जाएँ, तब भी प्रेम अपने एहसासों से मुखरित होता है.

शावर भकत, वृंदावन
बस इतना बता दो,
मेरे शब्दों में
जब-जब स्वयं को पढ़ते हो
और स्वयं से मिलते हो,
तब-तब कैसा अनुभव करते हो?
होंठों से न सही,
शब्दों की निःशब्दता में ही बता दो,
क्योंकि नीरवता में ही
मौन प्रेम की ऋचाएँ मुखरित होने लगती हैं।