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इतिहास के धधकते पन्ने

चित्तौड़ दुर्ग की प्राचीर और युद्धकालीन इतिहास को दर्शाता दृश्य वीरता और बलिदान की गाथाओं के बीच युद्ध की मानवीय पीड़ा

गीता मित्तल, मेरठ

रणभेरी जब गूँज उठी थी,
काँप उठी थीं दुर्ग-दीवारें,
जीवन और मृत्यु के बीच में,
खड़ी हुई थीं कितनी नारियाँ।

रणथंभौर की धरती पूछे,
कितने दर्द समाए होंगे,
युद्धों की उन काली रातों में,
कितने सपने जलाए होंगे।

फिर चित्तौड़ की ऊँची प्राचीर,
संघर्षों की कथा सुनाती,
तेरह सौ तीन की वह घड़ी,
आज भी स्मृतियों में है आती।

पद्मावती की कथा भारत की,
लोककथाओं में जीवित है,
इतिहास और जनश्रुतियों का,
अपना अलग ही गीत है।

फिर कर्णावती का चित्तौड़,
संकट से जब घिर आया था,
पंद्रह सौ पैंतीस का सूरज,
एक नया इतिहास लिख आया था।

अकबर के घेरे में फिर जब,
चित्तौड़ अकेला पड़ गया,
जयमल-पत्ता के साहस से,
रण का हर क्षण अमर हुआ।

तेरह सौ तीन, पैंतीस
और अड़सठ की वे घड़ियाँ,
वीरता संग पीड़ा भी हैं,
इतिहास की ये अनकही कड़ियाँ।

नहीं केवल गौरव की गाथा,
नहीं केवल बलिदान की बात,
युद्धों की सबसे बड़ी कीमत,
देती है अक्सर मानव जाति।

आओ, इतिहास से कुछ सीखें,
शांति का दीप जलाते जाएँ,
वीरों को श्रद्धा से नमन करें,
पीड़ा को भी भूल न जाएँ।

धधकते पन्नों का यह इतिहास,
हमको इतना समझाता है—
युद्ध में किसी की जीत भले हो,
अंततः इंसान ही हार जाता है।

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