
डॉ. रत्ना मानिक
कुछ समय पहले तक मैं उस पर शब्दों के व्यंग्य-बाणों की वर्षा करते नहीं थकती थी। उसका ‘जो कहना है कहिए, मुझे कोई ग़म नहीं’ वाला तेवर और उसकी ज़िद्दी-सी चुप्पी मेरे क्रोध को सातवें आसमान पर पहुँचा देती थी… पर एक दिन पता नहीं कैसे मेरे अंदर की समूची ममता और नसों में प्रवाहित होता शिक्षक का लहू नवसृजन का उत्साह लिए कुछ कर गुज़रने पर आमादा हो गया।
उस दिन उसकी कक्षा में मेरा लास्ट पीरियड था। बच्चों की संख्या न के बराबर थी, क्योंकि अधिकांश बच्चे अलग-अलग कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए दूसरे विद्यालय गए थे।
अंगुली के इशारे से मैंने उसे अपने पास बुलाया।
“जतिन! मैं तुमसे कितने दिनों से तुम्हारी नोटबुक जाँचने के लिए माँग रही हूँ?”
“मिस! बहुत दिनों से।”
“तो फिर? तुम्हें समझ में नहीं आया कि नोटबुक असेसमेंट भी ज़रूरी है?”
“जी, मिस।”
“जतिन! बारहवीं की परीक्षा पास करनी है कि नहीं तुम्हें… बिना ग्रेजुएट हुए कुछ भी कर पाओगे क्या?” मेरी बातों में ममता की हल्की-सी… शीतल फुहार थी।
“हाँ, मिस! पढ़ाई तो किसी तरह से पूरी करनी ही होगी।” उसकी आँखों की मद्धिम-सी उजास मेरे चेहरे पर ठहर गई।
“तुम कुछ नशा भी करते हो न?” मेरी बेचैन आँखें उसके चेहरे पर कुछ तलाशने लगी थीं।
“हूँ… पर केवल सिगरेट।” उसकी नज़रें झुकी रहीं।
“जतिन! मेरी तरफ़ देखो।” अब मेरे गले में कुछ चुभने लगा था।
वहाँ खड़ा जतिन अब सिर्फ़ जतिन नहीं था, बल्कि वो सैकड़ों युवा लड़के थे, जो अपनी ही ज़िंदगी की असुरक्षा, अवसाद और कोई मुकाम हासिल न कर पाने के भय से संघर्ष कर रहे थे।
“क्या तुम अपनी माँ से प्यार नहीं करते?” मेरी आवाज़ की कंपन से वो चौंक गया।
“करता हूँ, मिस, लेकिन गहरा जुड़ाव महसूस नहीं होता, अब पहले जैसा कुछ भी महसूस नहीं होता… मैं… मैं पहले ऐसा नहीं था, मिस… पता नहीं कब… कैसे… मेरे अंदर बहुत कुछ बदलने लगा था। मिस… यारों की यारी में मार और धोखा दोनों मिला… अब कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा, मिस।”
उसकी बिखरती… टूटती-सी आवाज़ कहीं दूर से आती सुनाई दी।
मेरी आँखें अब सब्र का बाँध तोड़ने पर आमादा थीं… आवाज़ भरभरा कर बिखरने वाली थी…।
मैंने अपनी बाईं हथेली उसके सामने फैला दी।
“अपना हाथ मेरे हाथ पर रखो।” गले की चुभन को किसी तरह दबाते हुए मैंने धीरे से कहा था।
उसने हिचकते हुए मेरी हथेली पर अपनी ठंडी उँगलियों की पोर टिका दी।
“जतिन! वादा करो… वादा करो कि तुम धीरे-धीरे अपनी सिगरेट की लत कम करोगे… वादा करो कि तुम अपनी ज़िंदगी को बिखरने नहीं दोगे… वादा करो कि तुम परीक्षा पास करके आगे बढ़ोगे… वादा करो कि…” कहते-कहते मेरी आँखों ने मुझे धोखा दे दिया… आँखों से फिसलती हुई एक गर्म तरलता होठों की कोर तक आ पहुँची।
“मिस… मिस… मेरे लिए आप क्यों…?”
शायद मेरी संवेदना उसके गले को भी अवरुद्ध करने लगी थी।
