
पूनम सिंह
किसे कहते हैं?
अगर जानना चाहते हों, तो पूछो उन बेटियों से…
जो बेटी बनकर तो पराई थीं ही,
बहू बनकर, पत्नी बनकर,
माँ बनकर और सास बनकर भी
किसी को अपनी नहीं लगतीं।
हर पड़ाव पर
न जाने क्यों उन्हें
पराया ही समझ लिया जाता है…
हाँ, यह बात अलग है कि
उसने सबको अपना मानकर,
सबकी ख़िदमत में
अपनी पूरी ज़िंदगी गुज़ार दी।
वह देती रही…
निभाती रही…
सहती रही…
और हर बार
अपने हिस्से का सब्र
चुपचाप पीती रही।
शायद…
एक स्त्री के जीवन का दूसरा नाम ही
सब्र है।

बहुत आभार आपका