
भारती जोशी, उज्जैन
एक दूर-दराज के सीमावर्ती इलाके के गाँव में अमृता अपने दादा-दादी के साथ रहती थी। उसका बड़ा भाई समर सेना में जवान था और उसकी तैनाती लद्दाख की बर्फीली सरहद पर थी। रक्षाबंधन का त्योहार नजदीक था, लेकिन इस बार समर छुट्टी लेकर घर नहीं आ पा रहा था।
हर साल की तरह इस बार भी अमृता ने रक्षाबंधन से दो हफ्ते पहले ही भाई के लिए रेशमी राखी और उसकी पसंदीदा बेसन की बर्फी का डिब्बा डाक से भेज दिया था। लेकिन रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले डाकघर से खबर आई कि खराब मौसम और भूस्खलन के कारण डाक की गाड़ियाँ रास्ते में ही रुक गई हैं और राखी समय पर समर तक नहीं पहुँच पाएगी।
अमृता का मन उदास हो गया। उसने सोचा कि सरहद पर देश की रक्षा में तैनात उसका भाई त्योहार के दिन अपनी सूनी कलाई देखकर कितना अकेला महसूस करेगा।
रक्षाबंधन की सुबह अमृता गाँव के रेडियो स्टेशन पहुँची। वहाँ एक स्थानीय कार्यक्रम प्रसारित होता था, जिसमें सीमा पर तैनात जवानों के लिए उनके परिजनों के संदेश प्रसारित किए जाते थे। अमृता ने अपनी काँपती आवाज़ में माइक के सामने कहा—
“भैया, मेरी राखी भले ही बर्फ में दबकर रास्ते में रुक गई हो, लेकिन मेरा प्यार और दुआएँ हवा के हर झोंके के साथ तुम्हारे पास पहुँच रही हैं। तुम सरहद पर हो, इसलिए हम यहाँ सुरक्षित त्योहार मना पा रहे हैं। मेरी कलाई का वादा तुम्हारे इस फ़र्ज़ से बड़ा नहीं है।”
उधर, लद्दाख की माइनस डिग्री वाली ठंड में समर अपनी चौकी पर बैठकर छोटे-से ट्रांजिस्टर पर वही रेडियो स्टेशन सुन रहा था। बहन की आवाज़ सुनते ही उसकी आँखों में नमी आ गई। उसने पास पड़े लाल ऊन के धागे का एक टुकड़ा उठाया और खुद ही अपनी कलाई पर बाँध लिया।
उसी शाम समर ने सैटेलाइट फोन से गाँव में फोन किया। उसने अमृता से कहा-“तेरी राखी मुझ तक पहुँच गई, अमृता। भले ही वो डाक से न आई हो, लेकिन तेरी आवाज़ और तेरी दुआ ने मेरी कलाई को सूना नहीं रहने दिया।”
अमृता के चेहरे पर मुस्कान खिल गई।
दोनों समझ गए थे कि रक्षाबंधन सिर्फ हाथ में धागा बाँधने का नाम नहीं है, बल्कि दो दिलों के उस अनदेखे और अटूट जुड़ाव का नाम है, जिसे कोई दूरी या मौसम कभी कम नहीं कर सकता।

भाई बहन के पावन प्रेम को प्रस्तुत करती हुई एक बहुत ही भावनात्मक ओर मर्मस्पर्शी कहानी🙏🙏