
गीता मित्तल, मेरठ
मिट्टी का ये घर है अपना,
पाँच तत्वों का ये तन।
आज सजेगा, कल मिट जाएगा,
क्यों करूँ इसकी मैं फ़िक्र?
मिट्टी है सब, क्यों फ़िक्र करूँ,
माया जोड़ फ़िक्रमंद रहूँ।
जो आया है, जाएगा एक दिन,
खाली हाथ ही जाना है।
धन-दौलत और मान-सम्मान,
सब यहीं धरा रह जाना।
जिसके पीछे भागे जीवन भर,
वो भी यहीं रह जाना।
रिश्ते-नाते, मोह-ममता,
सबका अपना समय यहाँ।
जितनी साँसें लिखकर भेजीं,
उतना ही है सफ़र यहाँ।
आती-जाती पंछियों जैसी,
साँस हमारी चलती जाती।
जिस दिन उड़ जाए पंछी ये,
मिट्टी मिट्टी में मिल जाती।
फिर क्यों इतना मोह जगाएँ,
क्यों मन पर बोझ बढ़ाएँ?
जब तक साँसें साथ हैं अपने,
प्रेम बाँटें और मुस्कान।
मिट्टी से आए, मिट्टी में मिलना,
यही जगत की रीत रही।
जो पल मिला है जीवन में,
यही जीने की प्रीत रही।
