
गीता मित्तल, मेरठ
एक सभा हुई मुर्दों की,
सब अपना-अपना दुख गाने लगे।
जो किया था ज़िंदा देह में रहकर,
बैठकर उसका हिसाब लगाने लगे।
किसी ने बोला-धन ज़रूरी,
किसी ने कहा-महल ज़रूरी।
किसी ने रिश्तों को तौला,
किसी ने अपना मुँह नहीं खोला।
एक बोला-मैंने नाम कमाया,
दुनिया में बड़ा मुकाम बनाया।
दूसरा बोला-मैंने सब जीता,
फिर भी मन का खालीपन नहीं रीता।
किसी ने रिश्तों की गठरी बाँधी,
किसी ने मन में मैल रखा।
किसी ने अपनों को खूब सताया,
किसी ने प्रेम का दीप जलाया।
कहीं किसी का घड़ा भरा था,
कोई खाली औंधे मुँह पड़ा था।
कर्मों का लेखा छँटने लगा,
हिस्सों का दुख जब बँटने लगा।
कोई बोला-परिवार भी अपना,
जीवन-जगत रहा एक सपना।
अपनी ही ‘मैं-मैं’ की ख़ातिर,
उम्र भर धन भरता रहा।
तभी दूर से भय-नाद हुआ,
सभा में सन्नाटा छा गया।
होकर सवार भैंसे पर ‘वह’,
दंड बाँटने को आ गया।
न कोई धन साथ था उसके,
न कोई रिश्तेदार-संबंधी।
न था किसी के हाथ में कुछ,
बस कर्मों का था भार भरा।
‘वह’ बोला—क्यों करते थे इतना
जीवन भर तुम अभिमान?
जिसे अपना समझकर जोड़ते रहे,
वही रह गए सभी अनजान।
धन-दौलत, ऊँचे पद, रिश्ते
सब जगत में छोड़ आए हो।
खाली हाथ आए थे जग में,
खाली हाथ ही अब आए हो।
बस कर्मों की पूँजी साथ तुम्हारे,
जिससे बच न पाओगे तुम।
जैसा बोया था जीवन में,
वैसा ही फल पाओगे तुम।
सभा में फिर गहरी चुप्पी थी,
सबकी आँखें झुकी हुई थीं।
जीवन भर जो बातें टाली थीं,
आज वही बातें समझ में आईं।
‘वह’ फिर बोला-जाना सबको है,
फिर क्यों इतना मोह पाला?
जीवन मिला था प्रेम बाँटने को,
तुमने क्यों ‘मैं’ को संभाला?
सभा में बैठे सारे मुर्दे,
एक-दूसरे को देखने लगे।
जो बात जीवन में समझ न पाए,
आज मरकर समझने लगे।
और तभी लगा जैसे सभा ने,
जीवित दुनिया में जीवन को पुकारा
“अभी समय है, लौट भी जाओ,
जीवन को जीवन-जैसा बनाओ।
रिश्ते बचा लो, मन साफ़ करो,
प्रेम बाँट दो थोड़ा-सा।
कर्मों का घड़ा भरने से पहले,
क्या भर रहे हो—जाँच लो थोड़ा-सा।
फिर सभा धीरे-धीरे थम गई,
‘वह’ भी लौट गया अपनी राह।
एक प्रश्न छोड़ गया पीछे—
उत्तर जान लो, थाम लो अपनी राह।”
