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 झील के किनारे

शाम के समय झील के किनारे टहलती महिला और दूर खड़ा एक प्रेमी जोड़ा कुछ जगहों पर प्रेम की शुरुआत होती है, तो कुछ जगहों पर रिश्तों के अंत की कहानी भी लिखी जाती है.

अमिता श्रीवास्तव, लखनऊ

तबादले के बाद हम उस शहर में नए-नए पहुँचे थे. शहर से बाहर एक अच्छी-सी कॉलोनी में हमने अपना नया बसेरा बनाया. साफ-सुथरी, शांत, सुंदर-सी कॉलोनी. पास में एक झील थी, जहाँ शाम के समय चहल-पहल रहती थी.

घर व्यवस्थित होने के बाद मैंने शाम की वॉक के लिए झील का किनारा ही चुन लिया. झील के साथ दो किलोमीटर लंबी, चौड़ी-सी सड़क थी. दूसरी पटरी पर कुछ दुकानें, घर एवं इक्का-दुक्का रेस्टोरेंट थे. बीच में डिवाइडर था, जिस पर पेड़-पौधे लगे होने के कारण हरियाली भी खूब थी.

कुछ दिनों बाद मैंने महसूस किया कि शहर से बाहर यह झील प्रेमी युगलों के मिलने की मनपसंद जगह है. मुझे रोज़ चार-छह जोड़े दिख जाते. कुछ नई नौकरी वाले, कुछ कॉलेज वाले, तो कुछ इतने छोटे, जैसे नौवीं-दसवीं कक्षा के छात्र हों.

अब वॉक के साथ यह मेरा अच्छा टाइम पास था. कार में बैठे हुए युवा जोड़ों को देखना या मोटरसाइकिल पर ही केक काटकर एक-दूसरे को लगाना, मुझे रास आने लगा था.

“यहाँ न जाने कितनी जोड़ियाँ बनती होंगी,” मैं सोचती.

एक दिन कुछ अलग दिखा.

मोटरसाइकिल के सहारे एक अधेड़ आदमी खड़ा था. उम्र लगभग पैंतालीस के आसपास होगी. उसके साथ एक महिला थी, जिसकी पीठ मेरी तरफ थी. आदमी ने अपने हाथ का घेरा महिला की कमर पर बनाया हुआ था.

न जाने क्यों मुझे लगा कि ये पति-पत्नी नहीं हो सकते.

यह विचार आते ही मैंने उनके करीब पहुँचते वक्त जानबूझकर अपनी चाल धीमी कर दी.

“ऐसे कब तक चलेगा, मुझे अपने पति से तलाक तो लेना ही पड़ेगा.”

सुनते ही मैंने पलटकर देखा. चालीस की उम्र की महिला थी वो.

“बाप रे….. तो झील के इस किनारे पर जोड़ियाँ बनती ही नहीं, बल्कि बसी-बसाई गृहस्थियाँ उजड़ती भी हैं.”

मेरी चाल खुद-ब-खुद तेज हो गई थी.

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