
डॉ.अनुपमा भार्गव
गुलमोहर की घनी छाँव वाला
वो एक बड़ा सा घर
कभी आरती कभी
रामायण की चौपाइयों से
गुंजित घर
कभी कभी तो विशाल
बरगद सा बन जाता है
उसकी हरेक शाखा में
मुझे अपने पिता का चेहरा
नज़र आता है
अपनी विराटता में छाँव देता
अन्य सभी शाखाओं को
कैसे अलविदा कहूँ उस तरह को
मन यह समझ नहीं पाता है
पापा आपकी याद तो
हमेशा ही आती है
बार बार आँखों में
आँसू भर लाती है
सारा धीर मेरा तब
डोल डोल जाता है
जब आपका वात्सल्य भरा
चेहरा याद आता है
आप जहाँ कहीं भी हों
आप तक मेरी पुकार पहुँचे
आपके समस्त पितृत्व ममत्व हेतु
मेरी कृतज्ञता पहुँचे
आपसे वो बचपन में मिला
लाड़ दुलार
एक एक कौर खिलाने को
मेरी वो मान मनुहार
मेरी वो हर चिंता
हर उदासी को पढ़ लेना
बड़ी से बड़ी विपदा मेरी
आसानी से हर लेना
भूल नहीं सकती अनेक जन्म
लेकर भी वो हारी बीमारी में
रात दिन की सेवा
खुद की थोड़ी सी भी न करके
मेरी बहुत सी फ़िक्र करना
आपके सान्निध्य का वो
एक एक पल याद आता है
आँखों से आँसू बहते हैं
मन व्याकुल हो जाता है
अब कोई भी नहीं
जो आपकी तरह दिलासा
दे सके मुझे
हर मुश्किल में खड़ा
दिलासा दे सके मुझे
सपने में ही सही
दर्शन दो एक बार
आज आपकी गोदी में
फिर एक बार सिर रखने को
जी चाहता है
मेरे स्मृति शेष
पूज्य पिताजी को
सादर समर्पित
लेखिका के बारे में-
डॉ.अनुपमा भार्गव
हिंदी साहित्य के प्रति गहरी आस्था और संवेदनशील दृष्टि रखने वाली साहित्यकार हैं। राजस्थान की सांस्कृतिक धरती जोधपुर में जन्मी डॉ. भार्गव के व्यक्तित्व में साहित्य, संगीत और सृजनात्मकता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। हिंदी साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के साथ उन्होंने यू.जी.सी. नेट तथा पीएच.डी. जैसी शैक्षणिक उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। साहित्य का गहन अध्ययन उनके लिए केवल ज्ञान का विषय नहीं, बल्कि जीवन को समझने और मानवीय संवेदनाओं को शब्द देने का माध्यम है। उनकी रचनाओं में रिश्तों की आत्मीयता, स्मृतियों की कोमलता, जीवन के अनुभव और मानवीय संवेदनाएँ सहज और प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त होती हैं। उनकी लेखनी पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि ठहरकर महसूस करने के लिए आमंत्रित करती है। साहित्य के साथ-साथ गायन और वादन में भी उनकी विशेष रुचि है। यही बहुआयामी व्यक्तित्व उनकी रचनात्मकता को और समृद्ध बनाता है।
