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गुलमोहर की घनी छाँव पिता की याद में भावुक हिंदी कविता

 गुलमोहर की घनी छाँव

यह कविता पिता की स्मृतियों और उनके वात्सल्य को समर्पित एक भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। गुलमोहर की घनी छाँव और बचपन का घर कवयित्री के लिए पिता के स्नेह, सुरक्षा और अपनत्व का प्रतीक बन जाते हैं। पिता के दिए लाड़-दुलार, हर चिंता को समझने और कठिन समय में साथ देने की यादें आज भी उनके मन में जीवित हैं। पिता के जाने के बाद उनकी कमी और भी गहराई से महसूस होती है। कविता में बेटी अपने दिवंगत पिता को याद करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती है और मन में एक बार फिर उनकी गोद में सिर रखने की भावुक इच्छा प्रकट करती है।

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बाबूजी की हाथ घड़ी

मेरे पिताजी एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक थे, जिनकी तनख्वाह कम थी, लेकिन आत्मसम्मान और ज्ञान कूट-कूट कर भरा था। साल 1974 में उनके तबादले के समय, घर का सारा खर्च उधारी पर चलता था। घर का सामान बैलगाड़ी में शिफ्ट करना था, लेकिन पिताजी ने सबसे पहले 60 रुपए का उधार चुकाया। इसके लिए उन्होंने अपनी प्रिय सुनहरे डायल वाली हैनरी सैंडो घड़ी बेच दी।

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पिताजी और शिक्षक दिवस

मेरे लिए पिताजी ही जीवन के पहले शिक्षक थे। उनकी डाँट में करुणा थी और उनकी कठोरता में भी प्रेम छिपा था। उन्होंने केवल पढ़ाया नहीं, बल्कि सच्चाई, ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ जीना सिखाया। अद्भुत संयोग यह रहा कि शिक्षक होकर वे इसी शिक्षक दिवस के दिन इस संसार से विदा हुए—और अपने जीवन से यह अंतिम संदेश छोड़ गए कि सच्चा शिक्षक वही है, जो अपने आचरण और आदर्श से पीढ़ियों को दिशा देता है।

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