शिक्षा महाकुंभ 6.0 में उठेंगे बड़े सवाल

— डॉ. गरिमा भाटी (सह-मीडिया प्रभारी, शिक्षा महाकुंभ अभियान)
शिक्षा महाकुंभ 6.0 के आगामी आयोजन में जब शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर देश-दुनिया के शिक्षाविद् एक मंच पर विचार करेंगे, तब चर्चा केवल नई तकनीक के उपयोग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसके केंद्र में एक कहीं अधिक बड़ा और महत्वपूर्ण प्रश्न होगा कि जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता विद्यार्थी को जानकारी दे सकेगी, पाठ समझा सकेगी, अभ्यास सामग्री तैयार कर सकेगी और उसकी सीखने की गति का विश्लेषण कर सकेगी, तब शिक्षक की भूमिका क्या रह जाएगी?
9 से 11 अक्टूबर तक NIT हमीरपुर में आयोजित होने वाला शिक्षा महाकुंभ 6.0 ऐसे समय में हो रहा है, जब AI शिक्षा की पारंपरिक परिभाषाओं को तेजी से बदल रहा है। कुछ वर्ष पहले तक जिस तकनीक की चर्चा मुख्यतः शोध प्रयोगशालाओं और तकनीकी संस्थानों तक सीमित थी, वह आज विद्यार्थियों की पढ़ाई, शिक्षकों की तैयारी, शोध, मूल्यांकन और शैक्षिक प्रशासन तक पहुँच चुकी है। ऐसे में शिक्षा महाकुंभ में AI पर होने वाला विमर्श केवल तकनीक के स्वागत या विरोध का विमर्श नहीं है, बल्कि असली प्रश्न यह है कि AI को शिक्षा में शामिल करते हुए शिक्षा के मानवीय स्वरूप को कैसे सुरक्षित रखा जाए।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विशाल सूचना तक पहुँच और उसे व्यवस्थित करने की क्षमता है। विद्यार्थी किसी विषय पर प्रश्न पूछ सकता है और कुछ ही क्षणों में उसे उत्तर, उदाहरण, अभ्यास सामग्री तथा अलग-अलग तरीकों से समझाई गई व्याख्याएँ प्राप्त हो सकती हैं, लेकिन शिक्षा का उद्देश्य केवल उत्तर उपलब्ध कराना नहीं है। एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थी को यह भी सिखाता है कि कौन-सा प्रश्न पूछा जाना चाहिए, किसी उत्तर की विश्वसनीयता कैसे परखी जाए, उसके पीछे का तर्क क्या है और एक उत्तर से अगला प्रश्न कैसे जन्म लेता है। इसलिए AI के आने से शिक्षक अप्रासंगिक होने के बजाय अपनी भूमिका के एक नए चरण में प्रवेश कर सकता है। शिक्षक की भूमिका केवल ज्ञान देने वाले व्यक्ति की न रहकर ज्ञान के मार्गदर्शक, चिंतन के प्रेरक और विवेक के निर्माणकर्ता की हो सकती है।
शिक्षा महाकुंभ की व्यापक दृष्टि भी इसी परिवर्तन को समझने की आवश्यकता पर बल देती है, क्योंकि शिक्षा अब केवल पाठ्यक्रम और परीक्षा का विषय नहीं रही, बल्कि अनुसंधान, नवाचार, तकनीक, शिक्षक विकास और सामाजिक परिवर्तन से जुड़ा व्यापक क्षेत्र बन चुकी है।
कल्पना कीजिए कि एक ही कक्षा में तीस विद्यार्थी हैं और प्रत्येक की सीखने की आवश्यकता अलग है। किसी विद्यार्थी को गणित का एक सूत्र समझने में कठिनाई हो रही है, कोई विज्ञान में अपनी कक्षा से आगे बढ़ चुका है और किसी विद्यार्थी को भाषा संबंधी सहायता की आवश्यकता है। पारंपरिक व्यवस्था में शिक्षक को सीमित समय में इन सभी जरूरतों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। AI इस प्रक्रिया में शिक्षक की सहायता कर सकती है। वह अलग-अलग विद्यार्थियों के लिए अभ्यास सामग्री तैयार कर सकती है, उनकी सीखने की कठिनाइयों के संकेत दे सकती है और शिक्षक को यह समझने में मदद कर सकती है कि किस विद्यार्थी को अतिरिक्त सहयोग की आवश्यकता है।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर हमेशा बना रहेगा: AI विद्यार्थी के प्रदर्शन को देख सकती है, शिक्षक विद्यार्थी को देखता है। मान लीजिए किसी विद्यार्थी के अंक लगातार कम हो रहे हैं। AI यह पहचान सकती है कि उसका प्रदर्शन गिर रहा है और यह भी बता सकती है कि किन प्रश्नों में वह बार-बार गलती कर रहा है, लेकिन यह समझना कि उस विद्यार्थी के भीतर वास्तव में क्या चल रहा है, केवल डेटा के आधार पर संभव नहीं है। हो सकता है समस्या विषय की कठिनाई न होकर आत्मविश्वास की कमी हो। हो सकता है वह किसी पारिवारिक परिस्थिति से गुजर रहा हो या अपनी क्षमता पर विश्वास खो चुका हो। शिक्षा का यह मानवीय पक्ष किसी एल्गोरिदम से कहीं बड़ा है।
इसलिए भविष्य की सफल कक्षा वह नहीं होगी, जिसमें AI सबसे अधिक हो, बल्कि वह होगी, जिसमें AI और शिक्षक अपनी-अपनी क्षमताओं के साथ मिलकर काम करें।
AI के युग में मूल्यांकन की व्यवस्था को भी बदलना होगा। जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ ही क्षणों में निबंध लिख सकती है, प्रश्नों के उत्तर दे सकती है और प्रस्तुति तैयार कर सकती है, तब केवल यह पूछना कि विद्यार्थी ने कितना याद रखा, पर्याप्त नहीं रहेगा। शिक्षा व्यवस्था को ऐसे प्रश्नों की ओर बढ़ना होगा, जो विद्यार्थी की सोच, तर्क, रचनात्मकता, आलोचनात्मक दृष्टि और समस्या-समाधान क्षमता को परखें।
भविष्य की परीक्षा शायद यह नहीं पूछेगी कि “आपको क्या पता है?”, बल्कि यह पूछेगी कि “जो आपको पता है, उसका उपयोग आप कैसे करते हैं?” और उससे भी महत्वपूर्ण यह कि “जो AI ने बताया है, क्या आप उसकी सत्यता परख सकते हैं?” यहीं से डिजिटल साक्षरता आगे बढ़कर AI literacy का रूप लेगी।
हालांकि AI शिक्षा को आसान बना सकती है, लेकिन आसान शिक्षा हमेशा बेहतर शिक्षा नहीं होती। यदि विद्यार्थी हर उत्तर के लिए AI पर निर्भर हो जाए, हर विचार मशीन से लेने लगे और प्रत्येक असाइनमेंट बिना स्वयं सोचे तैयार करने लगे, तो तकनीक उसकी क्षमता बढ़ाने के बजाय उसकी सोचने की आदत को कमजोर कर सकती है। इसलिए शिक्षा महाकुंभ जैसे मंचों पर यह प्रश्न उतना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए कि AI का उपयोग कैसे किया जाए, जितना यह कि उसका उपयोग कितना किया जाए।
अकादमिक ईमानदारी, विद्यार्थियों के डेटा की गोपनीयता, AI से उत्पन्न गलत सूचनाएँ, डिजिटल असमानता और तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता जैसे विषय आने वाले समय में शिक्षा नीति के केंद्र में होंगे।
AI के इस दौर में भारत के सामने एक अनोखा अवसर भी है। भारत केवल आधुनिक तकनीक का उपभोक्ता बनने के बजाय अपनी शिक्षा-दृष्टि और भारतीय ज्ञान परंपरा के आधार पर ऐसा मॉडल विकसित कर सकता है, जिसमें तकनीक आधुनिक हो, लेकिन उद्देश्य मानवीय हो। भारतीय शिक्षा परंपरा में ज्ञान का उद्देश्य केवल सूचना प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर विवेक, अनुशासन, संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास भी रहा है।
यदि आधुनिक AI को इस दृष्टि से जोड़ा जाए, तो ऐसा शैक्षिक मॉडल विकसित किया जा सकता है, जहाँ मशीन विद्यार्थी की सहायता करे, लेकिन निर्णय लेने की क्षमता विद्यार्थी की अपनी हो; AI सीखने की गति बढ़ाए, लेकिन शिक्षक सीखने का अर्थ समझाए।
यही शिक्षा महाकुंभ 6.0 की वास्तविक प्रासंगिकता भी है कि यह शिक्षा के सामने आने वाले उन प्रश्नों को व्यापक विमर्श का हिस्सा बनाता है, जिनके उत्तर आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा व्यवस्था की दिशा तय करेंगे।
आने वाले वर्षों में यह तय करने की आवश्यकता नहीं होगी कि AI शिक्षा में आएगी या नहीं, क्योंकि वह आ चुकी है। अब प्रश्न यह है कि वह शिक्षा को किस दिशा में ले जाएगी। क्या वह शिक्षक का स्थान लेगी या शिक्षक को अधिक सक्षम बनाएगी? क्या वह विद्यार्थियों को अधिक स्वतंत्र बनाएगी या तकनीक पर अधिक निर्भर? क्या वह शिक्षा को व्यक्तिगत बनाएगी या उसे डेटा-निर्भर बना देगी? क्या वह ज्ञान को अधिक लोकतांत्रिक बनाएगी या डिजिटल असमानता को बढ़ाएगी?
इन प्रश्नों के उत्तर केवल तकनीक नहीं दे सकती। इन्हें शिक्षा जगत को मिलकर खोजना होगा। शायद यही शिक्षा महाकुंभ 6.0 की सबसे बड़ी सार्थकता है कि ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के इस मंच पर भविष्य की शिक्षा केवल चर्चा का विषय नहीं होगी, बल्कि उसे गढ़ने की कोशिश भी होगी।
क्योंकि आने वाले समय की कक्षा में AI निश्चित रूप से होगी, लेकिन उस कक्षा में मानवीय संवेदना, विवेक और शिक्षक की भूमिका कितनी मजबूत रहेगी, यह निर्णय तकनीक नहीं, हम स्वयं करेंगे.
