फ्रेंडशिप डे

सुबह की सुनहरी रोशनी में झील किनारे एक महिला के हाथ पर फ्रेंडशिप बैंड बाँधती हुई एक युवा लड़की, पृष्ठभूमि में शांत पार्क और भावनात्मक माहौल। कभी-कभी एक अनजान व्यक्ति भी हमें दोस्ती का सबसे बड़ा अर्थ सिखा जाता है

प्रीति राही, बंगलौर

आज सुबह पाँच बजे उठकर चाय की तलब होने लगी। लेमन टी बनाई, क्योंकि फ्रिज में दूध नदारद था। पिछले कई दिनों से सुबह की सैर पर नहीं गई थी। सोचा, सैर पर निकलती हूँ, दूध भी ले आऊँगी। सुबह की सैर पर जाने से सारा दिन ख़ुशगवार हो जाता है। घर से निकलने से पहले झील की मछलियों के लिए कुछ दाना भी साथ रख लिया। आख़िर पानी तो उनके पास था ही। मछलियाँ मेरा इंतज़ार करती होंगी।

मछलियों को दाना खिलाने के बाद मेरी निगाहें झील किनारे सुबह की सैर पर आने वाले दोस्तों को तलाशने लगीं।

मैं फूलों से बातें करते हुए, पेड़ों से मन्नत माँगते हुए धीमी रफ़्तार से चलती जा रही थी। तभी सामने से एक जोड़े को आते देख मेरी नज़रें स्वतः नीचे झुक गईं। यूँ तो किसी की बातें सुनना अच्छी बात नहीं, लेकिन इश्क़ के फ़साने किसे अच्छे नहीं लगते? मेरी रफ़्तार और सुस्त हो गई थी और कान सुपर एक्टिव।

“कल फ्रेंडशिप डे था, तुमने तो मैसेज भी नहीं किया और न ही मेरा मैसेज देखा।” लड़की का लहज़ा शिकायती था।

“अरे यार, मैं किसी का मैसेज नहीं देखता और न ही जवाब दे पाता हूँ…” लड़के ने रुखाई से जवाब दिया।

“अरे, कोई बात नहीं। मुझे पता है, तुम्हारे बहुत सारे दोस्त हैं। तुम्हें वक़्त नहीं मिला होगा।” लड़की ने लड़के की बाँह में बाँह डालते हुए कहा।

“हाँ यार, दोस्त तो बहुत हैं, लेकिन मैं कहीं भी नहीं फँसता…” लड़के ने बेपरवाही से कहा।

लड़की ने एक झटके से अपनी बाँह खींची और सीधे पार्क के गेट के बाहर निकल गई। मैं भी उसके पीछे-पीछे पार्क से बाहर आ गई। उसकी आँखों से आँसू टपक रहे थे। मैंने उसे प्यार से पुचकारते हुए पूछा, “क्या हुआ बेटा, रो क्यों रही हो?”

शायद उसकी दुखती रग छू गई थी।

आँसुओं का सैलाब बह निकला। रोते-रोते वह बोली, “देखिए मैडम, कितनी ओछी सोच रखते हैं कुछ लड़के। प्रेम या दोस्ती को ‘फँसाने’ जैसे शब्दों से अपमानित करते हैं। वो मेरे प्रेम के लायक है ही नहीं। अब मैं कभी नहीं मिलूँगी उससे… मैडम… मैडम…”

“हाँ, बोलो… क्या बात है? क्या कहना चाहती हो?” मैंने जिज्ञासा से पूछा।

वह कुछ पल ख़ामोश रही। फिर उसने फुर्ती से अपने पर्स से एक फ्रेंडशिप बैंड निकाला, मेरे हाथ पर बाँध दिया और आगे बढ़ गई।

मैं स्तब्ध थी। कुछ पलों तक उसे दूर तक निहारती रही।

ज़ेहन में एक ताज़ा जुमला उभर रहा था

“सिर्फ़ सुबह के भूले ही शाम को घर लौटने पर भूले नहीं कहलाते, शाम के भूले भी अगर सुबह घर लौट आएँ, तो उन्हें भूला नहीं कहा जाता।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *