
सुरेश परिहार, पुणे
राघव और रिद्धिमा अलग-अलग शहरों में रहते थे। महीनों से उनकी बातें चल रही थीं। सुबह की पहली गुड मॉर्निंग से लेकर रात की आखिरी शुभरात्रि तक, दोनों एक-दूसरे की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके थे। फिर एक दिन राघव ने फैसला किया कि अब समय आ गया है कि वे पहली बार आमने-सामने मिलें।
जिस दिन राघव रिद्धिमा के शहर पहुँचा, स्टेशन पर दोनों की धड़कनें जैसे एक-दूसरे की आवाज़ सुन रही थीं। ट्रेन रुकी, राघव नीचे उतरा और उसकी नज़र भीड़ में रिद्धिमा को खोजने लगी। कुछ ही क्षणों बाद दोनों की आँखें मिलीं। न कोई फिल्मी संवाद हुआ, न कोई नाटकीय दृश्य। बस दोनों मुस्कुराए और कुछ पल तक एक-दूसरे को देखते रहे। ऐसा लग रहा था मानो तस्वीरों और वीडियो कॉल के पीछे छिपा इंसान आज सचमुच सामने आ गया हो। स्टेशन से निकलकर वे रिद्धिमा के घर पहुँचे, जहाँ राघव के ठहरने की व्यवस्था की गई थी। घर का माहौल सहज था, लेकिन दोनों के दिलों में हल्की-सी झिझक अभी भी मौजूद थी। जब भी उनकी नज़रें मिलतीं, दोनों मुस्कुरा देते और फिर तुरंत दूसरी तरफ देखने लगते।
अगली सुबह रिद्धिमा ने राघव की पसंद की अदरक वाली चाय बनाई। चाय पीते-पीते राघव ने कहा,
“चलो, शहर घुमाओ।”
बस फिर क्या था, दोनों निकल पड़े उन गलियों की ओर, जो आने वाले वर्षों में उनकी सबसे प्यारी यादें बनने वाली थीं।
चलते-चलते उन्हें सड़क किनारे एक छोटी-सी चाय की दुकान दिखी। दोनों वहाँ रुक गए। कुल्हड़ की गर्म चाय, हल्की हवा और एक-दूसरे का साथ… उस साधारण-सी जगह को भी खास बना रहे थे।
राघव बीच-बीच में चोरी-चोरी रिद्धिमा को देखता रहता और जब रिद्धिमा उसे देख लेती, तो दोनों हँस पड़ते।
दोपहर में वे एक मेहंदी लगाने वाली दुकान के पास पहुँचे। रिद्धिमा ने मज़ाक में कहा,
“मुझे मेहंदी लगवानी है।”
वह बैठ गई और मेहंदी वाली डिजाइन बनने लगी। कुछ देर बाद राघव ने शरारत करते हुए मेहंदी का कोन अपने हाथ में ले लिया।
“मैं भी लगाऊँ?” उसने पूछा।
रिद्धिमा ने मुस्कुराकर अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया।
राघव ने काँपते हाथों से उसकी हथेली पर एक छोटा-सा दिल बनाया और फिर बड़ी सावधानी से अपना नाम छिपा दिया। रिद्धिमा उसे देखती रही।
वह मेहंदी का डिज़ाइन शायद दुनिया का सबसे परफेक्ट डिज़ाइन नहीं था, लेकिन उस दिन वह उसके लिए सबसे खूबसूरत था।
शाम को घर लौटकर दोनों छत पर बैठे। सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था। बातें करते-करते रिद्धिमा ने राघव के सिर में हल्की-सी मालिश करनी शुरू कर दी। पूरे दिन घूमने के बाद राघव को बहुत अच्छा लग रहा था।
कुछ देर बाद उसने हँसते हुए कहा,
“अब मेरी बारी।”
रिद्धिमा हँस पड़ी, लेकिन अगले ही पल वह चुपचाप उसके पास बैठ गई। दोनों के बीच का अपनापन अब पहले से कहीं ज्यादा सहज हो चुका था।
दूसरे दिन सुबह रिद्धिमा रसोई में व्यस्त थी। वह राघव का पसंदीदा खाना बना रही थी। बीच-बीच में पीछे मुड़कर देखती कि कहीं वह उसे देख तो नहीं रहा।
और सच तो यह था कि राघव काफी देर से दरवाजे पर खड़ा उसे ही देख रहा था।
जब खाना तैयार हुआ, तो दोनों साथ बैठे। कभी रिद्धिमा अपने हाथ से उसे खिलाती, कभी राघव उसे। दोनों जानते थे कि ये छोटे-छोटे पल ही बाद में सबसे बड़ी यादें बनेंगे।
उस रात वे छत पर गए। आसमान तारों से भरा हुआ था। दोनों एक-दूसरे के पास बैठे रहे। कभी तारों को देखते, कभी एक-दूसरे को।
बीच-बीच में खामोशी भी आती, लेकिन वह खामोशी भी बहुत कुछ कह जाती थी।
रिद्धिमा ने धीरे से अपना हाथ राघव के हाथ पर रख दिया। राघव ने उसे थाम लिया।
उस पल दोनों को लगा जैसे पूरी दुनिया बहुत दूर रह गई है और बस वे दोनों और यह खूबसूरत रात ही बाकी है।
फिर आया तीसरा दिन…
समय जैसे जानबूझकर तेज़ भागने लगा था। स्टेशन पर वापस पहुँचकर दोनों चुप थे। बहुत सारी बातें थीं, लेकिन कोई भी शब्द नहीं बन पा रहे थे।
ट्रेन चलने वाली थी।
रिद्धिमा ने धीरे से कहा,
“अपना ख्याल रखना…”
राघव मुस्कुराया। उसकी आँखों में नमी थी।
“और हाँ… मैं बाय नहीं कहूँगा।”
रिद्धिमा की आँखें भर आईं।
“फिर मिलेंगे…” उसने धीमे से कहा।
ट्रेन चलने लगी। राघव खिड़की के पास बैठा था और रिद्धिमा प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी।
दोनों मुस्कुरा रहे थे, लेकिन आँखें नम थीं।
ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म से आगे बढ़ने लगी। रिद्धिमा की मुस्कान अब भी वहीं खड़ी थी, लेकिन उसकी आँखों की नमी राघव के दिल तक पहुँच चुकी थी।
राघव खिड़की से तब तक देखता रहा, जब तक रिद्धिमा भीड़ में एक धुँधली-सी परछाईं बनकर ओझल नहीं हो गई।
उसने सिर सीट से टिकाया और आँखें बंद कर लीं।
मन में बस एक ही बात बार-बार गूँज रही थी—
कुछ सफ़र ऐसे होते हैं,
जो पैरों से नहीं…
दिल से तय किए जाते हैं।
डर इस बात का नहीं था
कि पंद्रह सौ किलोमीटर कैसे कटेंगे…
डर तो इस बात का था
कि लौटेगा किसके साथ?
रिद्धिमा तो उसी शहर में रह जाएगी-
अपनी उसी मुस्कान,
उसी चाय की खुशबू,
उसी छत,
उसी मेहंदी की हल्की-सी रंगत के साथ…
और वह…
अपने ही कुछ हिस्से
उसके कमरे की हवा में टाँग आया था।
उसे लगा जैसे उसकी हँसी
रिद्धिमा की किताबों के किसी पन्ने में दब गई है।
उसकी ख़ामोशी
उस कुल्हड़ वाली चाय की आखिरी चुस्की में घुल गई है।
उसकी उँगलियों का स्पर्श
अब भी रिद्धिमा की हथेलियों पर बने उस छोटे-से दिल के आसपास ठहरा हुआ होगा।
लोग कहते हैं, यादें साथ चलती हैं…
लेकिन राघव सोच रहा था-
यादें कभी कंधा नहीं बनतीं।
वे रेल की खिड़की से बाहर भागते पेड़ों को देखकर आँसू नहीं पोंछतीं।
वे यह भी नहीं पूछतीं कि-“थक गए हो?”
ट्रेन आगे बढ़ती रही…
हर स्टेशन के साथ शहर पीछे छूटता गया, लेकिन रिद्धिमा उससे दूर नहीं हुई।
वह तो अब उसके भीतर बस चुकी थी।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि मोहब्बत साथ रहने का नाम भर नहीं है, कभी-कभी यह लौट आने की सबसे कठिन परीक्षा भी होती है। उस दिन राघव अकेला नहीं लौट रहा था।
उसके साथ रिद्धिमा की हँसी थी….उसकी अदरक वाली चाय की खुशबू थी….मेहंदी में छिपा अपना नाम था,
छत पर बिताई वह तारों भरी रात थी…. और वह स्पर्श था, जिसने तीन दिनों को पूरी उम्र की याद बना दिया था।
साथ ही…
उसका थोड़ा-सा वजूद रिद्धिमा के पास रह गया था, और रिद्धिमा का थोड़ा-सा दिल उसके साथ लौट रहा था।
ट्रेन अपनी मंज़िल की ओर बढ़ती रही… लेकिन राघव जानता था कि उसकी असली मंज़िल अब कोई शहर नहीं,
रिद्धिमा थी।
क्योंकि कुछ मुलाकातें कुछ दिनों की होती हैं,
लेकिन उनकी यादें पूरी उम्र साथ चलती हैं।
और कुछ प्रेम ऐसे होते हैं…
जिनमें कोई पूरी तरह जाता नहीं,
और कोई पूरी तरह लौटता भी नहीं।

Super
मिलन ओर जुदाई के प्यार भरे पलो को जीवंत करती बहुत शानदार कहानी
Nice story.