
सुनीता चौधरी, नीमच (मध्य प्रदेश)
प्रथम मेरे माता-पिता को वंदन,
जिनके चरणों में है मेरा नमन।
जिन्होंने मुझे बचपन में चलना सिखाया,
अपने हाथों से खाना खिलाना सिखाया।
रात भर जब मैं सोती नहीं थी,
तब माँ रात भर जागती रहती थीं।
धीरे-धीरे जब मैं बड़ी होने लगी,
तब पापा-मम्मी को बड़ी खुशी होने लगी।
पापा-मम्मी की मैं दूसरी संतान थी,
फिर भी भाई से अधिक उनकी प्यारी थी।
अचानक एक दिन स्कूल जाना पड़ा,
वहाँ कानूनगो बहनजी से मिलना पड़ा।
कक्षा पहली से उन्होंने पढ़ना सिखाया,
हमारे जीवन को आगे बढ़ना सिखाया।
मेरी प्यारी गुरु माता बड़वानी में रह गईं,
और हम पापा के तबादले के साथ जावरा आ गए।
उन्होंने मुझे बेटी जैसा स्नेह दिया,
उस प्यार ने हमेशा मिलने को मजबूर किया।
जब भी मुझे गुरु माता की याद आती,
मैं जावरा से बड़वानी मिलने चली जाती।
उन्होंने मुझे इतना प्यार और आशीष दिया,
जिसकी कशिश मन में आज भी बसी है।
कानूनगो बहनजी मेरी प्रिय गुरु थीं,
वे मेरी प्रथम गुरु और मेरी माँ की सहेली थीं।
उन्होंने ही मुझे प्रेरणा दी थी,
उन्हीं की प्रेरणा से मैं शिक्षिका बनी थी।
आज भी उनकी बहुत याद आती है,
माता-पिता और गुरु सदा मेरे हृदय में बसते हैं।
प्रथम मेरे माता-पिता को वंदन,
गुरुचरणों में मेरा बार-बार नमन।
